भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में एक आम धारणा लंबे समय से बनी रही है कि यदि किसी व्यक्ति को अदालत द्वारा भगोड़ा घोषित कर दिया गया है, तो उसके लिए anticipatory bail का दरवाज़ा अपने-आप बंद हो जाता है। यही सोच CrPC की धारा 82 के साथ जुड़ गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने Asha Dubey v. State of Madhya Pradesh जैसे मामलों में इस धारणा को स्पष्ट रूप से खारिज किया और कहा कि धारा 82 की घोषणा anticipatory bail पर स्वतः या पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाती। अब जब CrPC की जगह Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS) लागू हो चुकी है, तो यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि नए कानून के तहत इस सिद्धांत को कैसे समझा जाए।
BNSS ने प्रक्रिया को ज़्यादा तकनीक-आधारित, पारदर्शी और अधिकार-केंद्रित बनाने की कोशिश की है, लेकिन मूल संवैधानिक सिद्धांत—व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्यायिक विवेक—आज भी उतने ही मजबूत हैं। BNSS के अंतर्गत भी proclamation की व्यवस्था मूल रूप से उसी उद्देश्य के लिए है, जिसके लिए पहले CrPC की धारा 82 थी, यानी ऐसे अभियुक्त के खिलाफ प्रक्रिया चलाना जो बार-बार समन या वारंट के बावजूद अदालत के सामने उपस्थित नहीं हो रहा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि proclamation होते ही अदालत का विवेक समाप्त हो जाता है।
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सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि anticipatory bail कोई तकनीकी अधिकार नहीं, बल्कि Article 21 से जुड़ा हुआ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण है। BNSS के लागू होने के बाद भी यह सिद्धांत बदला नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को proclaimed घोषित किया गया है, तो अदालत को यह देखना होगा कि क्या वह जानबूझकर कानून से भाग रहा था, या क्या proclamation की प्रक्रिया केवल औपचारिकता निभाने के लिए की गई। कई बार देखा गया है कि अभियुक्त को समन या वारंट की वास्तविक जानकारी तक नहीं होती, फिर भी जल्दबाज़ी में proclamation की कार्यवाही कर दी जाती है।
BNSS की spirit यह है कि criminal procedure केवल दंडात्मक न होकर न्यायसंगत भी हो। ऐसे में anticipatory bail पर विचार करते समय अदालत यह देखेगी कि अभियुक्त का आचरण कैसा रहा है, क्या वह जांच में सहयोग करने को तैयार है, क्या उसके फरार होने की वास्तविक आशंका है, और क्या proclamation का सहारा केवल दबाव बनाने के लिए लिया गया है। यदि इन तथ्यों के आधार पर अदालत को लगता है कि अभियुक्त की स्वतंत्रता को बिना ठोस कारण के कुचलना न्याय के विरुद्ध होगा, तो anticipatory bail पर विचार किया जाना पूरी तरह वैध है।
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यह भी समझना ज़रूरी है कि BNSS में तकनीक और रिकॉर्ड-keeping पर जो ज़ोर दिया गया है, वह proclamation जैसी कार्यवाहियों की समीक्षा को और आसान बनाता है। अब अदालतें पहले से ज़्यादा स्पष्ट रूप से देख सकती हैं कि क्या प्रक्रिया वास्तव में कानून के अनुसार अपनाई गई थी या नहीं। इससे anticipatory bail के मामलों में मनमानी की संभावना कम होती है और न्यायिक विवेक ज़्यादा संतुलित रूप से प्रयोग किया जा सकता है।
व्यवहारिक रूप से देखें तो यह सिद्धांत आम नागरिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यदि केवल proclamation के आधार पर anticipatory bail को स्वतः अस्वीकार मान लिया जाए, तो यह पुलिस कार्रवाई को अनुचित रूप से शक्तिशाली बना देगा। BNSS का उद्देश्य ऐसा नहीं है। नए कानून का उद्देश्य है कि जांच प्रभावी हो, लेकिन साथ ही नागरिक अधिकार सुरक्षित रहें। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट बार-बार दोहराता रहा है कि proclamation कोई “punishment” नहीं है, बल्कि एक procedural step है, और procedural steps को कभी भी मौलिक अधिकारों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता।
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अंततः BNSS के संदर्भ में भी यही निष्कर्ष निकलता है कि proclamation का मतलब anticipatory bail का अंत नहीं है। अदालत को हर मामले में तथ्यों, परिस्थितियों और अभियुक्त के व्यवहार के आधार पर विवेकाधिकार का प्रयोग करना होगा। यह दृष्टिकोण न केवल संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है, बल्कि एक संतुलित और मानवीय आपराधिक न्याय प्रणाली की भी पहचान है।
