BNSS धारा 105: अब पुलिस की तलाशी कैमरे के सामने
भारत में अगर किसी आम व्यक्ति से पूछा जाए कि उसे पुलिस कार्रवाई में सबसे ज़्यादा किस बात का डर लगता है, तो जवाब अक्सर यही होगा — “कहीं झूठी बरामदगी न दिखा दी जाए।” वर्षों से तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया को लेकर यही अविश्वास बना रहा है। घर में अचानक पुलिस आ जाए, कुछ दस्तावेज़ या सामान उठा ले, और बाद में केस डायरी में लिख दिया जाए कि “फलाँ चीज़ बरामद हुई” — ऐसे मामलों की कहानियाँ हर शहर, हर कस्बे में सुनने को मिलती हैं।
इसी पृष्ठभूमि में Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS) की धारा 105 को एक ऐतिहासिक सुधार माना जा रहा है। यह धारा पहली बार यह अनिवार्य करती है कि पुलिस द्वारा की जाने वाली हर तलाशी और संपत्ति की जब्ती ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ ही की जाएगी। अब यह महज़ एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की सुरक्षा का मजबूत औज़ार बन चुकी है।
यह कानून यह मानकर चलता है कि जब कोई कार्रवाई कैमरे के सामने होती है, तो उसकी निष्पक्षता अपने आप बढ़ जाती है। BNSS धारा 105 इसी सिद्धांत पर आधारित है — पारदर्शिता ही न्याय की पहली शर्त है।
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तलाशी, जब्ती और कैमरा: BNSS धारा 105 असल में क्या बदलती है?
अब तक तलाशी की प्रक्रिया मुख्य रूप से लिखित दस्तावेज़ों पर आधारित थी। पुलिस पंचनामा बनाती थी, गवाहों के हस्ताक्षर होते थे, और अदालत में वही रिकॉर्ड पेश किया जाता था। लेकिन BNSS धारा 105 इस सोच को आगे ले जाती है। यह कहती है कि केवल काग़ज़ी रिकॉर्ड पर्याप्त नहीं है, बल्कि दृश्य साक्ष्य भी उतना ही ज़रूरी है।
इस धारा के अनुसार, जब भी किसी स्थान पर तलाशी ली जाती है या कोई संपत्ति जब्त की जाती है, तो पूरी प्रक्रिया की रिकॉर्डिंग अनिवार्य होगी। इसमें तलाशी की शुरुआत से लेकर जब्ती सूची तैयार होने तक का पूरा दृश्य शामिल होना चाहिए। रिकॉर्डिंग मोबाइल फोन जैसे साधारण उपकरण से भी की जा सकती है, ताकि यह तर्क न दिया जा सके कि तकनीकी संसाधन उपलब्ध नहीं थे।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह रिकॉर्डिंग केवल पुलिस के पास नहीं रह सकती। कानून यह स्पष्ट करता है कि रिकॉर्ड की गई सामग्री बिना किसी देरी के मजिस्ट्रेट को भेजी जाएगी — चाहे वह जिला मजिस्ट्रेट हों, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट हों या प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट। इसका उद्देश्य साफ है: पुलिस कार्रवाई पर न्यायिक निगरानी सुनिश्चित करना।
इस प्रावधान का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अब अदालत के पास यह जांचने का एक स्वतंत्र साधन होगा कि तलाशी निष्पक्ष थी या नहीं। अगर किसी व्यक्ति पर झूठी बरामदगी का आरोप लगाया गया है, तो वीडियो रिकॉर्डिंग सच्चाई सामने ला सकती है। इसी तरह, अगर पुलिस ने सही और ईमानदार तरीके से कार्रवाई की है, तो वही रिकॉर्डिंग अभियोजन के लिए मज़बूत सबूत बन सकती है।
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आम नागरिक के दृष्टिकोण से देखें तो यह धारा एक सुरक्षा कवच की तरह है। अब तलाशी केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं रहेगी, बल्कि एक जवाबदेह प्रक्रिया होगी। यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता — की भावना को व्यवहार में उतारता है।
हालाँकि यह भी सच है कि आने वाले समय में अदालतें यह तय करेंगी कि अगर रिकॉर्डिंग नहीं की गई तो उसका कानूनी प्रभाव क्या होगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि रिकॉर्डिंग का अभाव अब गंभीर सवाल खड़े करेगा, और पुलिस को उसका ठोस कारण बताना पड़ेगा।
BNSS धारा 105 यह संकेत देती है कि भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली अब धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ रही है जहाँ तकनीक केवल सुविधा नहीं, बल्कि न्याय की गारंटी बनेगी।
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निष्कर्ष
BNSS की धारा 105 सिर्फ़ एक नया कानूनी प्रावधान नहीं है, बल्कि यह उस सोच का प्रतिबिंब है कि कानून को जनता के भरोसे के साथ चलना चाहिए। अगर इस प्रावधान को ईमानदारी से लागू किया गया, तो यह न केवल झूठी बरामदगी और मनमानी पर रोक लगाएगा, बल्कि पुलिस और नागरिकों के बीच भरोसे की खाई को भी पाटेगा।
