भारत में दहेज कोई नया विषय नहीं है। यह एक ऐसी सामाजिक बुराई है जो कानून बनने के बावजूद आज भी अलग–अलग रूपों में हमारे समाज में मौजूद है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी और दिशा-निर्देश देते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ियों को विवाह में समानता के विचार के प्रति संवेदनशील बनाना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है। यह टिप्पणी केवल अदालत की टिप्पणी नहीं है, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाला एक संवैधानिक संदेश है।
विवाह को भारतीय समाज में पवित्र संस्था माना जाता है, लेकिन जब यही विवाह लेन-देन, मांग और दबाव का माध्यम बन जाए, तो यह संस्था अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी सच्चाई को स्वीकार करते हुए कहा कि दहेज जैसी कुप्रथा केवल कानून से समाप्त नहीं होगी, बल्कि इसके लिए सामाजिक सोच में बदलाव ज़रूरी है।
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आज भी कई परिवार यह मानते हैं कि दहेज देना या लेना परंपरा का हिस्सा है। लेकिन संविधान की नज़र में विवाह दो बराबर व्यक्तियों के बीच साझेदारी है, न कि आर्थिक सौदेबाज़ी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों में इसी मूल संवैधानिक मूल्य को दोहराया है।
दहेज निषेध अधिनियम, 1961 पहले से ही दहेज को अपराध घोषित करता है। इसके साथ ही भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 (पूर्व में IPC 498A) महिलाओं को क्रूरता से संरक्षण देती है। इसके बावजूद अदालतों के सामने आने वाले मामलों से यह साफ़ होता है कि समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि कानून की समझ और सामाजिक मानसिकता की है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि बचपन से ही बच्चों को यह सिखाया जाए कि विवाह में पति और पत्नी बराबर हैं, तो दहेज जैसी मांगों की मानसिकता अपने आप कमजोर होगी। उदाहरण के तौर पर, जब किसी बेटे को यह सिखाया जाता है कि विवाह के बाद पत्नी कोई आर्थिक लाभ नहीं बल्कि जीवन साथी है, तो दहेज की मांग का सवाल ही नहीं उठता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दहेज केवल शादी के समय ली जाने वाली रकम नहीं है। विवाह के बाद भी यदि किसी महिला पर आर्थिक दबाव डाला जाता है, तो वह भी दहेज के दायरे में आता है। कई मामलों में देखा गया है कि शादी के कुछ वर्षों बाद कार, फ्लैट या व्यवसाय के लिए पैसे की मांग की जाती है। कानून की दृष्टि में यह भी दहेज अपराध है।
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सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था की भूमिका पर भी ज़ोर दिया। अदालत के अनुसार, स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रमों में लैंगिक समानता और संवैधानिक मूल्यों को शामिल किया जाना चाहिए। जब छात्र कानून की किताबों में केवल धाराएं नहीं, बल्कि उनके पीछे का उद्देश्य समझेंगे, तभी समाज में वास्तविक बदलाव आएगा।
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि दहेज विरोधी कानूनों का दुरुपयोग न हो। सुप्रीम कोर्ट पहले भी यह कह चुका है कि कानून का उद्देश्य संरक्षण है, प्रतिशोध नहीं। इसलिए अदालत ने संतुलन की बात करते हुए कहा कि जांच एजेंसियां और अदालतें दोनों पक्षों के अधिकारों की रक्षा करें।
वास्तविक जीवन में इसका अर्थ यह है कि यदि किसी महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता है, तो उसे बिना डर के कानूनी सहायता मिलनी चाहिए। वहीं, किसी निर्दोष व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर अपराधी न माना जाए। यही संवैधानिक न्याय का मूल सिद्धांत है।
सुप्रीम कोर्ट का यह दृष्टिकोण भविष्य की पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक है। यह संदेश देता है कि कानून केवल सज़ा देने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का औज़ार भी है। जब न्यायपालिका समानता की बात करती है, तो उसका प्रभाव केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की सोच पर पड़ता है।
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आज ज़रूरत है कि परिवार, स्कूल, मीडिया और सरकार—सभी मिलकर दहेज के ख़िलाफ़ एक साझा प्रयास करें। केवल कानून बना देने से नहीं, बल्कि कानून को जीवन का हिस्सा बनाने से बदलाव आएगा। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उसी दिशा में एक मज़बूत कदम है। सुप्रीम कोर्ट का यह संदेश साफ़ है—दहेज के ख़िलाफ़ लड़ाई अदालतों से ज़्यादा समाज में लड़ी जानी चाहिए। विवाह में समानता केवल कानूनी सिद्धांत नहीं, बल्कि मानवीय मूल्य है। यदि आने वाली पीढ़ी इसे समझ लेती है, तो दहेज जैसी कुप्रथाएं अपने आप समाप्त हो जाएंगी।
