आपराधिक कार्यवाही की तीन मुख्य अवस्थाएँ: एक सरल लेकिन गहरी कानूनी समझ
पहला चरण: Pre-Trial Stage – जब मामला अदालत तक पहुँचने की तैयारी करता है
Pre-Trial Stage वह समय होता है जब अपराध की जानकारी मिलती है और राज्य (State) यह तय करता है कि मामला अदालत में ले जाया जाए या नहीं। यह वह चरण है जहाँ सबसे ज़्यादा अधिकारों का उल्लंघन भी होता है और सबसे ज़्यादा सावधानी की ज़रूरत भी होती है। इस चरण की शुरुआत आमतौर पर सूचना से होती है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए किसी व्यक्ति के साथ धोखाधड़ी हुई। वह नज़दीकी पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत देता है। पुलिस उस सूचना को दर्ज करती है, जिसे आम भाषा में FIR कहा जाता है। BNSS 2023 के तहत FIR अब डिजिटल माध्यम से भी दर्ज की जा सकती है, ताकि पुलिस शिकायत दर्ज करने से मना न कर सके।
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इसके बाद आता है जांच (Investigation) का चरण। जांच का मतलब केवल आरोपी को पकड़ना नहीं है, बल्कि यह पता लगाना है कि अपराध हुआ भी है या नहीं, किसने किया, कैसे किया, और क्या सबूत हैं।
जांच पूरी होने पर पुलिस यह तय करती है कि मामला अदालत में भेजा जाए या नहीं। अगर पर्याप्त सबूत मिलते हैं, तो Chargesheet दाखिल होती है। अगर सबूत नहीं मिलते, तो मामला बंद भी हो सकता है। यही वह बिंदु है जहाँ कई निर्दोष लोग मुकदमे से पहले ही बच जाते हैं—और यही Pre-Trial Stage का सबसे बड़ा महत्व है।
दूसरा चरण: Trial Stage – जहाँ अदालत तय करती है दोष या निर्दोष
Trial Stage वह चरण है जहाँ मामला पहली बार पूरी तरह न्यायिक मंच पर आता है। यह वह समय है जब अदालत prosecution और defence—दोनों को सुनती है। Trial की शुरुआत अदालत द्वारा यह देखने से होती है कि chargesheet वैध है या नहीं। इसके बाद आरोप तय किए जाते हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि आरोप तय होना सजा नहीं है। यह केवल यह बताने के लिए होता है कि आरोपी को किन बातों का जवाब देना है। इसके बाद prosecution अपना पक्ष रखता है। गवाह बुलाए जाते हैं। सबूत पेश किए जाते हैं। इन सबूतों की जाँच BSA 2023 के अनुसार होती है— क्या सबूत विश्वसनीय हैं? क्या chain of custody टूटी है? क्या electronic evidence सही तरीके से प्रमाणित है? फिर defence को पूरा मौका मिलता है। आरोपी चुप रह सकता है—यह उसका अधिकार है। वह गवाह पेश कर सकता है। वह prosecution के गवाहों से जिरह कर सकता है।
Trial Stage का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है— “Proof beyond reasonable doubt” यानि अगर थोड़ी भी वैधानिक शंका बचती है, तो उसका लाभ आरोपी को मिलता है। यहाँ एक वास्तविक जीवन का उदाहरण समझिए— अगर किसी हत्या के मामले में केवल यह साबित हो कि आरोपी आखिरी बार मृतक के साथ देखा गया था, लेकिन हत्या का सीधा सबूत नहीं है, तो केवल संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। Trial Stage का उद्देश्य बदला नहीं, बल्कि सत्य की खोज है।
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तीसरा चरण: Post-Trial Stage – फैसला, सजा और न्याय की अंतिम परीक्षा
BNS 2023 ने सजा को केवल दंड नहीं, बल्कि reformative दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की है।
अगर आरोपी या prosecution निर्णय से संतुष्ट नहीं है, तो Appeal का अधिकार मिलता है। यह अधिकार Post-Trial Stage का अहम हिस्सा है। यही वह चरण है जहाँ न्याय व्यवस्था अपनी गलतियों को सुधारती है।
Post-Trial Stage में Compensation, Parole, Probation, और Sentence Suspension जैसे पहलू भी आते हैं।
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निष्कर्ष
भारत की आपराधिक प्रक्रिया केवल अपराधियों को सजा देने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह निर्दोषों की रक्षा की प्रणाली है Pre-Trial Stage अधिकारों की ढाल है। Trial Stage सत्य की खोज है। Post-Trial Stage न्याय की अंतिम कसौटी। इन तीनों चरणों का संतुलन ही एक लोकतांत्रिक न्याय प्रणाली की पहचान है।
