भारत जैसे विशाल और विविध देश में, जहां लोग नौकरी, पढ़ाई, कारोबार या परिवार के कारण अक्सर एक राज्य से दूसरे राज्य आते-जाते रहते हैं, वहीं अपराध और कानून की कार्यवाही भी राज्य की सीमाओं में बंधी नहीं रहती। किसी व्यक्ति पर एक राज्य में मामला दर्ज हो, लेकिन वह किसी दूसरे राज्य में रह रहा हो—ऐसी स्थिति में पुलिस को उसे गिरफ्तार करने और न्यायालय में पेश करने की प्रक्रिया थोड़ी जटिल हो जाती है। आम लोग अक्सर यह नहीं समझ पाते कि इंटर-स्टेट गिरफ्तारी (Inter-State Arrest) कैसे होती है, पुलिस को कौन से अधिकार मिलते हैं, आरोपी के पास कौन से अधिकार होते हैं, और “ट्रांजिट रिमांड” या “ट्रांजिट बेल” जैसी कानूनी प्रक्रियाएं किन परिस्थितियों में लागू होती हैं।
कई बार हमने सुना है कि पुलिस किसी को “दिल्ली से गिरफ्तार कर के मुंबई ले गई”, या “बिहार पुलिस ने यूपी में छापेमारी की”, या “बेंगलुरु में रहने वाले शख्स को पंजाब पुलिस उठा ले गई।” ऐसे मामलों में लोगों के मन में पहला सवाल यह उठता है कि क्या कोई भी राज्य की पुलिस किसी दूसरे राज्य में जाकर किसी को गिरफ्तार कर सकती है? क्या उन्हें वहां की लोकल पुलिस की अनुमति लेनी होती है? क्या आरोपी के पास मौका होता है कि वह अपनी सुरक्षा, अपने अधिकार और अपने वकील की मदद पा सके?
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भारत में आपराधिक प्रक्रिया को अब पुराने CrPC की जगह BNSS 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita) ने पूरी तरह बदल दिया है। इसी कानून की कई धाराएं इंटर-स्टेट गिरफ्तारी, रिमांड, मजिस्ट्रेट के अधिकार और आरोपी के अधिकारों को बहुत स्पष्ट तरीके से बताती हैं। साथ ही, BNS (पुराने IPC का स्थान लेने वाला कानून) और BSA (पुराने Evidence Act की जगह) भी अप्रत्यक्ष रूप से इन प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं क्योंकि अपराध की प्रकृति और सबूतों के नियम इन्हीं कानूनों से निर्धारित होते हैं।
अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझने की है कि इंटर-स्टेट गिरफ्तारी एक संवेदनशील प्रक्रिया है। पुलिस का अधिकार और आरोपी का अधिकार—दोनों को संतुलन में रखा जाता है। कानून इस बात की अनुमति देता है कि पुलिस किसी भी राज्य में जाकर अपराध के आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है, लेकिन यह शक्ति अनियंत्रित नहीं है। कानून की कई शर्तें, प्रक्रियाएँ और सुरक्षा उपाय हैं जिन्हें पालन करना अनिवार्य है।
BNSS 2023 की धारा 170 और उससे संबंधित प्रावधान बताते हैं कि यदि किसी राज्य की पुलिस को किसी आरोपी को दूसरे राज्य में गिरफ्तार करना है तो उन्हें वहां की स्थानीय पुलिस को सूचना देना आवश्यक है। यह इसलिए ताकि गिरफ्तारी पारदर्शी रहे, किसी के साथ अवैध हिरासत या उत्पीड़न न हो, और आरोपी की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके। हालांकि, कई बार वास्तविक परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं कि समय बहुत कम होता है, आरोपी भाग सकता है, और पुलिस तुरंत कार्रवाई करना चाहती है। ऐसी स्थिति में स्थानीय पुलिस को तुरंत सूचना देकर, संयुक्त रूप से या उसकी उपस्थिति में गिरफ्तारी की जा सकती है।
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लेकिन गिरफ्तारी के बाद सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि पुलिस आरोपी को अपने राज्य तक ले जाने के लिए क्या कर सकती है? क्या वह आरोपी को मनमाने तरीके से ले जा सकती है? बिल्कुल नहीं। इसके लिए “ट्रांजिट रिमांड” नाम की कानूनी प्रक्रिया बनाई गई है। ट्रांजिट रिमांड का मतलब है कि जिस राज्य में आरोपी गिरफ्तार हुआ है, वहां के मजिस्ट्रेट के सामने आरोपी को पेश किया जाएगा और मजिस्ट्रेट यह तय करेगा कि क्या पुलिस को आरोपी को दूसरे राज्य ले जाने की अनुमति दी जा सकती है।
यह प्रक्रिया इसलिए आवश्यक है क्योंकि व्यक्ति का जीवन और स्वतंत्रता Article 21 के तहत संरक्षित है। अदालत यह जांचती है कि गिरफ्तारी वैध है या नहीं, FIR वास्तव में दर्ज हुई है या नहीं, आरोपी के साथ किसी प्रकार की अवैधता या दुर्व्यवहार की आशंका तो नहीं है, और क्या पुलिस का अनुरोध उचित है। इसी प्रक्रिया के दौरान आरोपी को अपने वकील का अधिकार मिलता है, जिसे “Right to Legal Representation” कहा जाता है। BNSS और संविधान दोनों यह सुनिश्चित करते हैं कि आरोपी को वकील की सहायता लेने का पूरा अवसर दिया जाए।
कई बार ऐसा भी होता है कि आरोपी के खिलाफ मामला जिस राज्य में दर्ज है, वहां पहुंचने में कई घंटे या कई दिन लग सकते हैं। ऐसे मामलों में आरोपी अदालत से “ट्रांजिट बेल” भी मांग सकता है। यह एक अस्थायी राहत होती है जो आरोपी को सिर्फ इतना समय देती है कि वह अपने खिलाफ दर्ज मामले वाले राज्य में जाकर उचित अदालत में अग्रिम जमानत या नियमित जमानत ले सके। ट्रांजिट बेल का मकसद यह है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा हो और वह मनमाने पुलिस अत्याचार का शिकार न बने।
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यही अधिकार पूरे भारत में लागू होते हैं और ये अधिकार किसी भी व्यक्ति से छीन नहीं सकते। इंटर-स्टेट गिरफ्तारी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि आरोपी की स्वतंत्रता, सुरक्षा और कानूनी सहायता का अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहता है। BNSS 2023 ने इस प्रक्रिया को और भी स्पष्ट, संरचित और नागरिक-अनुकूल बनाया है।
इंटर-स्टेट गिरफ्तारी का एक और पहलू यह है कि कई विशेष कानून, जैसे NDPS Act, POCSO Act, Prevention of Corruption Act, और UAPA जैसे कानून, पुलिस को कुछ अतिरिक्त शक्तियाँ देते हैं। लेकिन इन विशेष कानूनों में भी आरोपी के अधिकार खत्म नहीं होते। अदालतें हमेशा यह देखती हैं कि पुलिस अपनी शक्ति का दुरुपयोग न करे और आरोपी को उचित प्रक्रिया मिले।
भारत का न्यायिक ढांचा हमेशा इस सिद्धांत पर खड़ा है कि “bail is the rule, jail is the exception.” इसलिए जब भी गिरफ्तारी इंटर-स्टेट हो, अदालतें और पुलिस दोनों सुनिश्चित करते हैं कि आरोपी को बेसिक ह्यूमन राइट्स दिए जाएं।
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ये सभी अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21, 22 और BNSS के विभिन्न प्रावधानों से सुरक्षित हैं।
अदालतें इंटर-स्टेट गिरफ्तारी पर लगातार मार्गदर्शन देती रही हैं। कई महत्वपूर्ण फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ट्रांजिट रिमांड और ट्रांजिट बेल आरोपी की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बहुत जरूरी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि पुलिस जब दूसरे राज्य में जाकर गिरफ्तारी करती है, तो पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है—और लोकल पुलिस को सूचना देना अनिवार्य है।
अब इन सारे सिद्धांतों को एक आम इंसान के नज़रिए से देखते हैं—यदि आपके खिलाफ किसी अन्य राज्य में मामला दर्ज हो, तो आपको यह जानना जरूरी है कि आपको अधिकार है कि आपको उसी राज्य में दूसरी पुलिस अदालत के सामने पेश करेगी, न कि आपको सीधे ले जाकर किसी अनजान जगह छोड़ दे। आपको वकील मिलेगा, आप ट्रांजिट बेल मांग सकेंगे, और गिरफ्तारी की वैधता पर सवाल उठा सकेंगे।
यह जानकारी न सिर्फ आम नागरिकों के लिए बल्कि युवा वकीलों, कानून के छात्रों और पैरालीगल कार्यकर्ताओं के लिए भी बेहद जरूरी है। कई मामलों में सिर्फ जानकारी की कमी के कारण लोग घबरा जाते हैं, गलत कदम उठा लेते हैं, या पुलिस से डरकर अपने अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर पाते।
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इंटर-स्टेट गिरफ्तारी और ट्रांजिट रिमांड का असली उद्देश्य अपराध को रोकना नहीं है बल्कि कानून की प्रक्रिया को संतुलित तरीके से लागू करना है—जहां आरोपी का अधिकार और समाज का हित दोनों सुरक्षित रहें।
यदि भविष्य में BNSS में कुछ और सुधार होते हैं, तो यह उम्मीद की जा सकती है कि इंटर-स्टेट गिरफ्तारी की प्रक्रिया और भी डिजिटल, पारदर्शी और नागरिक-अनुकूल बनेगी।
