भारत में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की समस्या कोई नई नहीं है। सदियों से महिलाएँ केवल परिवार, समाज, रिश्तेदारी या सड़क पर ही नहीं, बल्कि अपने कार्यालयों, कॉलेजों, अस्पतालों, संस्थानों, उद्योगों और कारखानों में भी असुरक्षित महसूस करती रही हैं। इस असुरक्षा की जड़ें बहुत गहरी हैं—पितृसत्ता, शक्ति असंतुलन, पुरुष वर्चस्व, और कई बार संस्थानों में जवाबदेही की कमी। इसी संघर्ष की पृष्ठभूमि में 2013 में भारत ने The Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, जिसे हम सामान्यतः POSH Act कहते हैं, लागू किया। इसका उद्देश्य कार्यस्थल पर महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और गरिमा को सुनिश्चित करना था।
लेकिन कानून का होना ही सुरक्षा की गारंटी नहीं देता। असली चुनौती तब आती है जब कानून को व्याख्यायित करना पड़ता है—यानी ऐसी जटिल स्थितियाँ पैदा होती हैं जिनका उत्तर कानून की साधारण धाराओं में नहीं मिलता। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे ही महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट कर दिया कि अगर कोई महिला अपने workplace से अलग किसी संस्थान या department के कर्मचारी द्वारा sexually harassed की जाती है, तो वह अपने खुद के संगठन/department के Internal Complaints Committee (ICC) के पास शिकायत कर सकती है। यह फैसला POSH Act की व्याख्या में एक क्रांतिकारी मोड़ है, क्योंकि यह महिलाओं की शिकायतों की सीमाएँ नहीं बढ़ाता, बल्कि उनकी सुरक्षा का दायरा कई गुना विस्तार देता है।
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भारत में बहुत सी महिलाएँ ऐसे पदों पर काम करती हैं जहाँ उन्हें रोज़ अलग-अलग संस्थानों, विभागों या दफ्तरों के पुरुष कर्मचारियों से संपर्क करना पड़ता है—जैसे विश्वविद्यालय में guest faculty, contractual staff, inter-departmental work, outsourced workers, field officers, consultants या project-based employees। कई बार ऐसी स्थिति बनती है जहाँ उत्पीड़न करने वाला व्यक्ति complainant के workplace का हिस्सा नहीं होता, बल्कि किसी दूसरे संगठन, agency या department का कर्मचारी होता है।
इन सारे सवालों का स्पष्ट उत्तर हालिया Supreme Court के निर्णय ने दे दिया। यह फैसला असल में डॉ. सोहैल मलिक बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया के केस में आया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने न केवल POSH Act की व्याख्या की, बल्कि यह भी बताया कि यह कानून पैदा ही इसलिए किया गया था ताकि महिलाएँ डर, भ्रम, jurisdictional complications या departmental technicalities में फँसकर न्याय से वंचित न रह जाएँ।
न्यायालय ने यह कहा कि POSH Act को हमेशा उदार, सुरक्षात्मक और महिला-केंद्रित तरीके से पढ़ा जाना चाहिए। इसका उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा करना है, न कि उन्हें procedural labyrinth में धकेलना। Court ने यह भी कहा कि POSH Act मूल रूप से एक सामाजिक कल्याण कानून है—social welfare legislation—जिसकी व्याख्या technicalities के आधार पर नहीं बल्कि उसके मूल उद्देश्यों के आधार पर होनी चाहिए।
अब इस सिद्धांत को एक सरल उदाहरण से समझें—मान लीजिए एक महिला डॉक्टर दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल के department-A में काम करती है, लेकिन उसे रोज़ कई बार department-B, C या किसी बाहरी agency के कर्मचारियों से coordinate करना पड़ता है। यदि department-B का कोई कर्मचारी उसे sexually harass करता है—मेसिज भेजकर, inappropriate remarks देकर, physical proximity बनाकर, या किसी भी तरीके से—तो क्या उस महिला को department-B की ICC में जाना पड़े? सुप्रीम कोर्ट कहता है—नहीं। वह अपनी department की ICC में शिकायत कर सकती है।
अब किसी महिला को यह सोचने की जरूरत नहीं कि “accused किसी और building/department/agency का कर्मचारी है, मैं शिकायत कहाँ करूँ?”
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यह फैसला महिलाओं की agency, उनकी आवाज़ और उनके अधिकारों को मजबूत करता है। Supreme Court ने यह भी माना कि कई बार संगठन ICC की शिकायत यह कहकर reject कर देते हैं कि “यह accused हमारे department का नहीं है, आप complaint कहीं और दें।” Court ने ऐसी स्थिति को गलत ठहराया, और कहा कि POSH Act में कहीं भी यह नहीं लिखा कि jurisdiction केवल उसी workplace की ICC का है जहाँ आरोपी काम करता है। उल्टा, कानून का उद्देश्य यह है कि पीड़िता के लिए वह मंच उपलब्ध हो जहाँ वह बिना डर, बिना प्रतिशोध और बिना bias के अपनी शिकायत रख सके।
Court ने यह भी साफ किया कि यदि दो संगठनों में shared spaces, functional connectivity, interlinked work roles, joint committees, या collaborative projects हों, तो harassment किसी भी तरफ से हो सकता है। ऐसे मामलों में ICC को सिर्फ technicality के आधार पर हाथ खड़े नहीं करने चाहिए। Supreme Court ने यह भी कहा कि ICC केवल एक departmental body नहीं है, बल्कि एक quasi-judicial authority है, जो प्राकृतिक न्याय (natural justice) के सिद्धांतों का पालन करते हुए जनहित और महिला-सुरक्षा के broader perspective में फैसले देती है। इसलिए ICC का दायित्व केवल internal discipline तक सीमित नहीं है, बल्कि यह larger public interest और constitutional morality का हिस्सा है।
यह निर्णय यह भी बताता है कि POSH Act का उद्देश्य केवल sexual harassment की शिकायतों का निपटारा करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि महिलाएँ ऐसे वातावरण में काम कर सकें जहाँ उनका dignity, safety और autonomy सुरक्षित रहे। अब इस judgement के सामाजिक प्रभावों की बात करें तो यह निर्णय महिलाओं के confidence को काफी बढ़ाता है। यह workplace को safer बनाता है। employers को भी यह समझ आ जाता है कि jurisdictional excuses देने से अब POSH compliance से बचा नहीं जा सकता।
यह निर्णय उन पुरुषों के लिए भी संदेश है जो सोचते हैं कि departmental boundaries उन्हें accountability से बचा लेंगी। Supreme Court ने साफ कहा कि sexual harassment किसी boundary का सम्मान नहीं करता, तो कानून भी boundaries को बाधा नहीं बनने देगा।
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कई बार harassment subtle होता है—tone, gesture, unwanted proximity, sexist jokes, sexist statements, WhatsApp messages, favours मांगना, professional disadvantages देना—यह सब POSH Act की परिभाषा में आता है। और अगर यह harassment किसी दूसरे workplace के व्यक्ति से आया है, तो भी complaint की जगह वही है जहाँ महिला comfortable महसूस करती है। इस judgement से पहले बड़ी समस्या यह थी कि महिलाएँ अपनी jurisdiction समझ ही नहीं पाती थीं। ICC उन्हें return कर देती थी। फिर वे दूसरे ICC तक पहुँचती थीं जो कहती थीं “आप हमारे employee नहीं हो।” ऐसे में महिलाएँ शिकायत दायर करने से ही डर जाती थीं। Supreme Court ने इस समस्या का मूल समाधान दे दिया।
अब employer की ज़िम्मेदारी बढ़ गयी है—उन्हें cross-functional POSH frameworks बनाना होंगे; agencies और subcontractors के साथ POSH clauses strengthen करने होंगे; पोर्टल्स accessible बनाने होंगे; ICC training और sensitization ज़रूरी होगी। न्यायालय ने यह भी कहा कि यह judgement Article 14, 15, 19 और 21 के broader constitutional values के अनुरूप है। महिला सुरक्षा पर राज्य का कर्तव्य केवल statutory नहीं, बल्कि constitutional है।
अब इस judgement को लागू करने के बाद अगर कोई ICC शिकायत लेने से इंकार करती है, jurisdiction के नाम पर टालती है, या inquiry में delay करती है, तो यह POSH Act का उल्लंघन माना जाएगा—और संगठन पर legal liability, compensation liability, और departmental penalties लग सकती हैं। यह फैसला पूरी तरह से महिला-केंद्रित है, और justice-oriented है। यह उन महिलाओं को empowerment देता है जो अभी तक अपनी आवाज़ दबा देती थीं केवल इसलिए क्योंकि आरोपी किसी “और department” में होता था।
अब हर महिला को अपने workplace की सुरक्षा का पूरा अधिकार है—चाहे दुर्व्यवहार करने वाला व्यक्ति किसी भी संस्था का कर्मचारी क्यों न हो। यह judgement आने वाले वर्षों में देश भर के POSH jurisprudence को shape करेगा। यह training modules, ICC functioning, organizational policies, और employer duties पर व्यापक प्रभाव डालेगा। इस निर्णय का सार यही है—“कार्यस्थल वह जगह है जहाँ महिला को सुरक्षा मिलनी चाहिए, न कि legal complications।” और Supreme Court ने यह सुनिश्चित किया कि POSH Act अपने उद्देश्य के सबसे करीब जा सके—एक सुरक्षित, सम्मानित, और समतामूलक कार्यस्थल।
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