न्यायपालिका बहुत ही संवेदनशील और सोची-समझी प्रक्रियाओं पर आधारित है, खासकर उन मामलों में जहां राजनीति, भ्रष्टाचार या बड़े नेता जुड़े हों। National Herald Case उसी किस्म का मामला है—जहाँ Enforcement Directorate (ED) ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं राहुल गांधी और सोनिया गांधी के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग की शिकायत (chargesheet/complaint) दायर की, लेकिन दिल्ली की Rouse Avenue कोर्ट ने उस शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह न केवल एक केस का निर्णय है, बल्कि प्रक्रिया, न्यायिक विवेक और कानून के मूल सिद्धांत के बारे में भी स्पष्ट संदेश देता है।
सबसे पहले समझना जरूरी है कि National Herald Case क्या है। साल 2014 में राजनीति से जुड़े एक व्यक्ति ने यह आरोप लगाया था कि कांग्रेस नेताओं ने National Herald अखबार से जुड़ी संपत्ति को अवैध तरीके से नियंत्रित किया और उससे जुड़ी संपत्तियों का उपयोग भ्रष्ट तरीके से किया। Enforcement Directorate (ED) ने इस allegation के आधार पर आरोपियों के खिलाफ money laundering का prosecution complaint दाखिल किया, जिसे chargesheet के बराबर माना जाता है। इस complaint में राहुल गांधी, सोनिया गांधी और कुछ अन्य को आरोपी बताया गया।
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जैसा कि हम जानते हैं कि किसी भी अापराधिक मामला शुरू करने के लिए FIR (First Information Report) या Equivalent ECIR/complaint आवश्यक होता है। दिल्ली कोर्ट ने देखा कि ED की present complaint FIR जैसी predicate offence पर आधारित नहीं थी, बल्कि यह एक private complaint पर investigation के बाद बनी थी। इसका यह मतलब नहीं कि allegation गलत है, पर इसे सीधे न्यायालय द्वारा chargesheet की तरह मान लेना न्यायिक दृष्टिकोण से सही नहीं माना गया। अदालत ने साफ़ कहा कि “कोर्ट तब तक संज्ञान नहीं ले सकती जब तक उसकी पर्याप्त वैधानिक नींव (legal foundation) न हो।”
यह बात समझने योग्य है—कानून में कोई भी agency चाहे वह ED हो, CBI हो या कोई और, किसी भी व्यक्ति के खिलाफ prosecution complaint दाखिल कर सकती है, लेकिन उसका legal effect तब तक नहीं बनता जब तक कोर्ट उस complaint को स्वीकार न कर ले। स्वीकार करने का मतलब है — कोर्ट ने यह मान लिया कि शिकायत/chargesheet में इतने तथ्य हैं जिनके आधार पर accused पर मुकदमा चलाया जा सकता है। लेकिन Rouse Avenue कोर्ट ने यह निर्णय लिया कि वर्तमान complaint की नींव इतनी मजबूत नहीं दिखाई देती कि कोर्ट chargesheet स्वरूप उसे स्वीकार कर सके।
यह फैसला कोर्ट द्वारा trial से पहले की procedural scrutiny का एक उदाहरण है। मतलब — अदालत यह देखने के लिए कि आरोपों की वैधता, सबूतों की गुणवत्ता, procedural requirements की पूर्ति हुई है या नहीं, कोर्ट इस stage पर फैसला ले सकती है कि क्या उसे आगे की कार्यवाही करनी चाहिए? अदालत ने कहा कि वर्तमान complaint में कुछ कागज़ात जैसे documents या तथ्य स्पष्ट रूप से नहीं जुड़े हैं, और बिना पूर्ण जानकारी के कोर्ट आगे नहीं बढ़ सकती। इसीलिए कोर्ट ने कहा कि यह matter अभी “लंबित” है, और chargesheet की legal foundation पर संज्ञान नहीं लिया जाना चाहिए।
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यह निर्णय अब December 16, 2025 को एक नया मोड़ ले चुका है, जब कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि फिलहाल वह ED की chargesheet पर संज्ञान नहीं ले रही है। अदालत ने यह भी कहा कि ED की investigation private complaint के आधार पर हुई है, न कि FIR के आधार पर। इसी वजह से court ने उसकी complaint को chargesheet जैसा legal प्रभाव नहीं देने का निर्णय लिया।
यहाँ यह जानना बेहद महत्वपूर्ण है कि ED की complaint पर संज्ञान लेने से पहले कोर्ट को यह देखना होता है कि क्या उस complaint में predicate offence का foundation मौजूद है या नहीं। यानी कि क्या FIR जैसी शुरुआत सही ढंग से हुई थी। आमतौर पर ED money laundering के लिए prosecution complaint दाखिल करती है, लेकिन उसकी legality तब तक न्यायिक मान्यता नहीं पाती जब तक कोर्ट chargesheet नहीं स्वीकार करती। इससे न केवल accused को न्याय का पूरा अधिकार मिलता है, बल्कि procedural fairness भी सुसंगत रहती है। यही criminal justice के due process का मूल सिद्धांत है।
इस फैसले का राजनीतिक और सामाजिक असर भी गहरा रहा है। National Herald Case लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहा है। कांग्रेस पार्टी ने इस फैसले को एक “कानूनी राहत” के तौर पर लिया है और कहा है कि अदालत ने यह दिखा दिया कि ED की chargesheet में पर्याप्त नींव नहीं थी और आरोपों को साबित करने से पहले पहले नियमों का पालन होना चाहिए। वहीं बहुसंख्यक media और विपक्षी राजनीतिक दलों के बीच इस पर तीखी राजनीति भी होती रही है, लेकिन न्यायपालिका ने इस मामले में अपनी स्वतंत्रता और कानूनी सोच पर ज़ोर दिया।
इस पूरे प्रकरण में, याद रखने योग्य बात यह है कि chargesheet और FIR में फर्क होता है. FIR वह प्राथमिक सूचना होती है जो पुलिस प्रथम दृष्टया प्राप्त करती है, और उसके बाद investigation होती है। ED के मामले में भी पहले एक complaint पर जांच की गई थी, जिसमें बाद में chargesheet जैसा रूप दिया गया, लेकिन court ने यह कहकर उस पर आगे नहीं बढ़ा कि यह एक FIR नहीं है। यह decision साबित करता है कि कोर्ट सबूतों के आधार पर सोचती है, न कि media वित्त या राजनीतिक pressure के आधार पर। इससे judiciary की independence और due process का सम्मान जाहिर होता है।
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वास्तविक जीवन के दृष्टांत के लिए इसे ऐसे समझें—जब कोई पुलिस स्टेशन में कोई बड़ी शिकायत दर्ज की जाती है, तो पहले पुलिस रिकॉर्ड बनाती है, investigation करती है, और फिर chargesheet कोर्ट में पेश करती है। अगर chargesheet में required documents, statements या legal foundation नहीं मिलते, तो कोर्ट उसे स्वीकार नहीं करती और आरोपी को संज्ञान देने की प्रक्रिया रोक देती है। ठीक ऐसा ही National Herald Case में हुआ है, जहाँ ED की complaint ने कोर्ट को आश्वस्त नहीं किया कि chargesheet में सभी आवश्यक प्रक्रियाएँ पूरी हैं।
इसके अलावा कोर्ट ने यह भी विचार किया कि आरोपियों को सुनना भी आवश्यक है। देश का कानून—विशेष रूप से नए BNSS/CrPC equivalents—के तहत भी accused को सुनने का अधिकार Right to be heard (audi alteram partem) माना जाता है। इसका मतलब है कि कोर्ट किसी भी मामले में कोई sanction या order तभी दे सकती है जब आरोपी को पहले जवाब का मौका मिला हो। यही legal fairness का मूल सिद्धांत है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार दोहराया है।
आलोचक भी कहते रहे हैं कि ED की chargesheet राजनीतिक प्रभावित है, या FIR का foundation कमजोर है, या allegations पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वह सबूतों और διαδικियाओं के आधार पर विचार करेगी, न कि केवल 정치 या आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर। ऐसे निर्णय से यह भी सीख मिलती है कि कोर्ट की प्रक्रिया emotional rush से ऊपर है—यह जांच करती है कि क्या अदालत में आगे जाकर fair trial संभव है या नहीं।
अब सवाल उठता है कि अगला चरण क्या होगा? ED को अब अपने complaint को बेहतर तरीके से ठोस दस्तावेजों, legal basis और clear predicate offence के साथ रिकॉर्ड करना होगा। अगर bureaucracy या investigation में कमी लगी है, तो वह उसे सुधारकर पुनः अदालत के सामने पेश कर सकता है। अदालत फिर से विचार करेगी कि chargesheet स्वीकार करनी है या नहीं। इस प्रक्रिया का उद्देश्य आरोपियों का trial नहीं रोकना है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आरोप न्यायसंगत और विधिसम्मत ढंग से आगे बढ़ें।
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कुल मिलाकर, दिल्ली कोर्ट का यह निर्णय यह संकेत देता है कि Indian criminal justice system अभी भी due process, right to be heard, और legal foundation जैसे मूल सिद्धांतों पर अडिग है, चाहे मामला कितना भी ऊँचे स्तर के नेताओं के खिलाफ क्यों न हो। यह verdict उन लोगों के लिए भी सीख है जो सोचते हैं कि कलाकार, नेता या सामान्य व्यक्ति—सबके खिलाफ accusations का असर समान होता है। न्यायपालिका के समक्ष सबूत, प्रक्रिया और कानून ही सर्वोच्च होते हैं।
