भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में हाईकोर्ट की भूमिका हमेशा से बेहद महत्वपूर्ण रही है। जब कोई व्यक्ति अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को चुनौती देता है, तो अक्सर वह हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाता है। ऐसे मामलों में भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 का प्रयोग किया जाता रहा है, जिसके तहत हाईकोर्ट को “न्याय के हित में” अपने अंतर्निहित अधिकारों का उपयोग करने की शक्ति प्राप्त है। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर एक बेहद अहम और दूरगामी प्रभाव डालने वाला फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जब हाईकोर्ट किसी एफआईआर को रद्द (quash) करने से इनकार कर देता है, तब वह साथ-साथ आरोपी को “नो अरेस्ट” (गिरफ्तारी से संरक्षण) नहीं दे सकता और न ही जांच एजेंसियों पर समय-सीमा (deadline) थोप सकता है। यह फैसला केवल तकनीकी नहीं, बल्कि भारतीय आपराधिक कानून की मूल भावना से जुड़ा हुआ है। आम भाषा में समझें तो जब अदालत यह मान लेती है कि एफआईआर प्रथम दृष्टया सही है और जांच की ज़रूरत है, तब वह पुलिस के हाथ भी नहीं बाँध सकती। सुप्रीम कोर्ट ने यही संदेश इस फैसले के ज़रिए दिया है।
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अब सवाल यह उठता है कि आखिर धारा 482 का मकसद क्या है? यह धारा हाईकोर्ट को यह शक्ति देती है कि वह न्याय के दुरुपयोग को रोके और न्याय की प्रक्रिया को सुरक्षित रखे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत खुद जांच एजेंसी बन जाए या पुलिस की वैधानिक शक्तियों को निष्प्रभावी कर दे। पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया था कि कई मामलों में हाईकोर्ट एफआईआर रद्द करने से तो इनकार कर देता था, लेकिन साथ ही आरोपी को यह राहत दे देता था कि उसे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, या पुलिस को तय समय के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दे देता था। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, यह एक विरोधाभासी स्थिति है। अगर एफआईआर में दम है, तो जांच को उसके स्वाभाविक कानूनी रास्ते पर चलने देना चाहिए।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि गिरफ्तारी एक कानूनी प्रक्रिया है, जिसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और नए आपराधिक कानूनों के तहत नियंत्रित किया गया है। लेकिन यह निर्णय पुलिस का है, अदालत का नहीं—जब तक कि कोई स्पष्ट दुरुपयोग सामने न आए। उदाहरण के तौर पर मान लीजिए कि किसी महिला ने घरेलू हिंसा या धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज कराई है। आरोपी हाईकोर्ट जाकर एफआईआर रद्द करने की मांग करता है। हाईकोर्ट यह कहता है कि आरोपों की जांच होनी चाहिए और एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती, लेकिन साथ ही आरोपी को यह सुरक्षा दे देता है कि उसे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, यह पीड़ित के अधिकारों और जांच की निष्पक्षता दोनों के साथ अन्याय है।
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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जांच की समय-सीमा तय करना, विशेषकर तब जब एफआईआर को सही माना गया हो, जांच एजेंसियों के कामकाज में अनुचित हस्तक्षेप है। हर मामला अपने तथ्यों, साक्ष्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। अदालतें जांच की निगरानी कर सकती हैं, लेकिन माइक्रो-मैनेजमेंट नहीं।
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आजकल “नो अरेस्ट” आदेशों का चलन बढ़ता जा रहा था। कई बार प्रभावशाली आरोपी इस तरह की राहत हासिल कर लेते थे, जबकि आम नागरिकों को ऐसी सुविधा नहीं मिलती थी। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को मजबूत करता है। नए आपराधिक कानूनों के संदर्भ में भी यह निर्णय अहम है। चाहे वह गिरफ्तारी के नए मानदंड हों या जांच की पारदर्शिता—सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। अदालतें न तो पुलिस बन सकती हैं और न ही आरोपी के लिए ढाल।
इस फैसले का एक और बड़ा संदेश यह है कि अगर किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी से डर है, तो उसके लिए कानून में पहले से वैकल्पिक उपाय मौजूद हैं, जैसे अग्रिम जमानत। धारा 482 को इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि गिरफ्तारी की संभावना को खत्म कर दिया जाए। कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था को अधिक स्पष्ट, संतुलित और जवाबदेह बनाता है। यह न केवल जांच एजेंसियों को उनका वैधानिक क्षेत्र वापस देता है, बल्कि पीड़ितों के विश्वास को भी मजबूत करता है कि कानून केवल कागज़ों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी समान रूप से लागू होगा।
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निष्कर्ष
यह फैसला याद दिलाता है कि कानून में राहत और संरक्षण के अपने-अपने रास्ते हैं। हाईकोर्ट की शक्तियाँ व्यापक हैं, लेकिन असीमित नहीं। जब एफआईआर रद्द करने से इनकार किया जाता है, तब जांच को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने देना ही न्याय के हित में होता है।
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