क्यों भारत में न्याय में देरी होती है?
केस पेंडेंसी, डिजिटल कोर्ट और सुधार के उपाय
भारत के संविधान में कहा गया है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि समय पर होना चाहिए। लेकिन जब एक आम नागरिक अदालत का दरवाज़ा खटखटाता है, तो उसे अक्सर सालों—कभी-कभी दशकों—का इंतज़ार करना पड़ता है। यही कारण है कि हमारे यहाँ एक कहावत चल पड़ी है—“तारीख पर तारीख”। सवाल यह है कि आख़िर भारत में न्याय में इतनी देरी क्यों होती है? क्या यह केवल जजों की कमी की वजह से है, या समस्या इससे कहीं ज़्यादा गहरी है?
इस लेख में हम National Judicial Data Grid (NJDG) के वास्तविक आँकड़ों, ज़मीनी उदाहरणों और कानून की प्रक्रिया को समझते हुए यह जानने की कोशिश करेंगे कि न्याय में देरी की असली वजहें क्या हैं, डिजिटल कोर्ट क्या भूमिका निभा सकते हैं, और सुधार के कौन-से उपाय वास्तव में असरदार हो सकते हैं।
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भारत में न्याय में देरी की सच्चाई: आँकड़ों की भाषा
जब हम न्याय में देरी की बात करते हैं, तो यह केवल एक भावनात्मक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक डेटा-ड्रिवन सच्चाई है। National Judicial Data Grid द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि भारत की न्याय प्रणाली पर बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
Supreme Court से लेकर District Courts तक, लाखों नहीं बल्कि करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे मामलों की है जो एक साल से अधिक समय से pending हैं। यह स्थिति बताती है कि समस्या केवल “नए केस ज़्यादा दाख़िल होने” की नहीं, बल्कि “पुराने केस समय पर निपट न पाने” की भी है।
Supreme Court के आंकड़े दिखाते हैं कि हज़ारों civil और criminal मामले वर्षों से लंबित हैं। यह इसलिए चिंताजनक है क्योंकि Supreme Court केवल एक अपीलीय अदालत नहीं, बल्कि देश की संवैधानिक अदालत है। जब यहाँ देरी होती है, तो उसका असर पूरे न्याय तंत्र पर पड़ता है।
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District Courts: जहाँ आम आदमी फँस जाता है
अगर न्याय में देरी की असली तस्वीर देखनी हो, तो District Courts के आँकड़े देखना ज़रूरी है। यहीं से ज़्यादातर मुकदमे शुरू होते हैं—चाहे वो ज़मीन विवाद हो, घरेलू हिंसा का मामला हो, cheque bounce हो या फिर कोई आपराधिक केस।
NJDG के अनुसार District Courts में करोड़ों मामले लंबित हैं, और इनमें से एक बड़ी संख्या एक साल से ज़्यादा पुराने मामलों की है। इसका मतलब यह है कि एक आम नागरिक, जो पहली बार कोर्ट गया है, वह सालों तक केवल सुनवाई का इंतज़ार करता रहता है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने Section 138 NI Act के तहत cheque bounce का केस किया। कानून कहता है कि यह summary trial है और जल्दी निपटना चाहिए, लेकिन व्यवहार में यह केस भी 4–5 साल खिंच जाता है। इस दौरान शिकायतकर्ता आर्थिक और मानसिक दोनों रूप से टूट जाता है।
High Courts और Writ Culture का दबाव
High Courts को अक्सर लोग “तुरंत राहत देने वाली अदालत” मानते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि High Courts खुद भारी pendency से जूझ रही हैं। Writ Petitions, appeals, revisions और bail applications की संख्या इतनी ज़्यादा है कि High Courts के पास हर मामले को तुरंत सुनने का समय नहीं बचता।
Article 226 के तहत दाख़िल होने वाली writ petitions नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़ी होती हैं। लेकिन जब हजारों writs pending रहती हैं, तो अधिकार होने के बावजूद राहत देर से मिलती है। यहीं से “justice delayed is justice denied” वाली स्थिति पैदा होती है।
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न्याय में देरी के मुख्य कारण
भारत में न्याय में देरी किसी एक कारण से नहीं होती। इसके पीछे कई आपस में जुड़े हुए कारण हैं।
सबसे पहला कारण है जजों की भारी कमी। भारत में sanctioned posts के मुकाबले हज़ारों जजों के पद खाली हैं। जब एक जज पर हजारों केस हों, तो फैसले में देरी स्वाभाविक है।
दूसरा बड़ा कारण है पुरानी प्रक्रिया और बार-बार स्थगन (adjournments)। BNSS, BNS और Evidence Act की प्रक्रियाएँ विस्तार से सुनवाई की अनुमति देती हैं, लेकिन इनका दुरुपयोग भी होता है। गवाहों का न आना, वकीलों की अनुपस्थिति और बार-बार तारीख़ें—ये सब देरी को बढ़ाते हैं।
तीसरा कारण है सरकारी मुकदमेबाज़ी। सरकार देश की सबसे बड़ी litigant है। कई ऐसे मामले होते हैं जिन्हें appeal में नहीं जाना चाहिए, लेकिन फिर भी फाइल कर दिया जाता है, जिससे अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है।
डिजिटल कोर्ट: क्या यह असली समाधान है?
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने e-Courts, virtual hearings और digital filing जैसे कदम उठाए हैं। COVID-19 के दौरान virtual courts ने यह साबित किया कि तकनीक न्याय को तेज़ कर सकती है। Digital Courts से filing आसान हुई, cause lists transparent हुईं और छोटे-मोटे मामलों में physical appearance की ज़रूरत कम हुई। Traffic challans, petty offences और कुछ summary matters अब online निपटाए जा रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह भी है कि डिजिटल कोर्ट अपने-आप में समाधान नहीं हैं। अगर जजों की संख्या नहीं बढ़ेगी, procedural reforms नहीं होंगे और case management मजबूत नहीं होगा, तो तकनीक केवल एक tool बनकर रह जाएगी, समाधान नहीं।
सुधार के वास्तविक उपाय
न्याय में देरी कम करने के लिए सबसे पहले judge strength बढ़ाना ज़रूरी है। साथ ही, fast-track courts को स्थायी रूप देना चाहिए, न कि केवल अस्थायी योजनाओं की तरह।
दूसरा बड़ा सुधार है case management system। हर केस की time-line तय होनी चाहिए—जैसे evidence कितने समय में, arguments कब तक। Supreme Court और High Courts इस दिशा में guidelines दे सकते हैं।
तीसरा महत्वपूर्ण कदम है ADR mechanisms—mediation, arbitration और Lok Adalats को बढ़ावा देना। हर विवाद अदालत में ही सुलझे, यह ज़रूरी नहीं।
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निष्कर्ष
भारत में न्याय में देरी एक कड़वी सच्चाई है, लेकिन यह असंभव समस्या नहीं है। NJDG के आंकड़े हमें समस्या दिखाते हैं, और डिजिटल कोर्ट हमें समाधान की दिशा। ज़रूरत है राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक सुधार और न्याय को वास्तव में नागरिक-केंद्रित बनाने की। न्याय केवल फ़ैसला नहीं, बल्कि समय पर दिया गया फ़ैसला होना चाहिए—तभी संविधान का सपना पूरा होगा।
