कानून का उद्देश्य हमेशा से समाज के कमजोर वर्ग की रक्षा करना रहा है। POCSO Act भी इसी सोच के साथ बनाया गया था, ताकि बच्चों को यौन शोषण जैसे गंभीर अपराधों से सुरक्षा मिल सके। लेकिन समय के साथ यह साफ दिखाई देने लगा है कि इस कानून का इस्तेमाल कई बार अपने मूल उद्देश्य से भटककर उन युवाओं के खिलाफ हो रहा है, जिनका कोई आपराधिक इरादा नहीं होता, बल्कि वे केवल एक सामान्य भावनात्मक रिश्ते में होते हैं। इसी संदर्भ में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कि केंद्र सरकार को POCSO कानून में “Romeo-Juliet Clause” पर विचार करना चाहिए, भारतीय कानूनी व्यवस्था के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण संकेत है।
आज की सामाजिक वास्तविकता यह है कि किशोर अवस्था में भावनात्मक आकर्षण, दोस्ती और प्रेम एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। स्कूल, कॉलेज या मोहल्ले के वातावरण में युवा आपस में जुड़ते हैं, बातचीत करते हैं और कई बार रिश्ता बनता है। समस्या तब शुरू होती है जब ऐसे रिश्तों को परिवार स्वीकार नहीं करता और गुस्से या सामाजिक दबाव में आकर माता-पिता POCSO Act के तहत पुलिस में शिकायत दर्ज करा देते हैं। कानून की सख्त भाषा के कारण पुलिस को FIR दर्ज करनी पड़ती है, भले ही लड़की या लड़का खुद यह कह रहे हों कि रिश्ता उनकी मर्जी से था।
Read More: Proclaimed होने के बाद भी Anticipatory Bail? BNSS में कोर्ट का विवेकाधिकार
यह स्थिति इसलिए पैदा होती है क्योंकि वर्तमान कानून में 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति की सहमति को कानूनी मान्यता नहीं दी जाती। यदि लड़की 17 वर्ष 11 महीने की है और लड़का 19 वर्ष का, और दोनों आपसी सहमति से रिश्ते में हैं, तब भी लड़के पर बलात्कार और POCSO जैसी गंभीर धाराएँ लग सकती हैं। अदालतों में ऐसे हजारों मामले लंबित हैं, जहाँ अंत में न्यायाधीश यह तो मान लेते हैं कि रिश्ता consensual था, लेकिन कानून की मजबूरी के कारण प्रक्रिया लंबी चलती है और तब तक आरोपी युवक का भविष्य, करियर और सामाजिक छवि बर्बाद हो जाती है।
Romeo-Juliet Clause का विचार इसी समस्या के समाधान के रूप में दुनिया के कई देशों में अपनाया गया है। इसका अर्थ यह होता है कि यदि दो किशोरों के बीच उम्र का अंतर बहुत कम है, जैसे दो या तीन साल, और रिश्ता आपसी सहमति से है, तो उसे आपराधिक अपराध की श्रेणी से बाहर रखा जाए। इसका उद्देश्य यह नहीं है कि बच्चों की सुरक्षा कम की जाए, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कानून का दुरुपयोग न हो और मासूम युवाओं को अपराधी न बना दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने अवलोकन में यह पाया कि कई मामलों में POCSO कानून का उपयोग inter-caste या inter-religion रिश्तों को रोकने के लिए किया जा रहा है। माता-पिता इसे एक social control tool की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। अदालत ने यह भी माना कि हर मामला एक जैसा नहीं होता और कानून को सामाजिक यथार्थ के अनुसार व्यावहारिक होना चाहिए। यही कारण है कि अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि वह इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करे।
Read More: BNSS धारा 105: अब पुलिस तलाशी कैमरे में होगी
कानूनी दृष्टि से समस्या यह है कि वर्तमान व्यवस्था में न्यायाधीश के पास भी बहुत सीमित विवेकाधिकार बचता है। POCSO Act की प्रकृति strict liability जैसी हो गई है, जहाँ परिस्थितियाँ, भावना और वास्तविकता को देखने की गुंजाइश कम रह जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि एक सामान्य प्रेम संबंध भी criminal trial में बदल जाता है, जिसमें सालों लग जाते हैं। अंत में acquittal मिल भी जाए, तब तक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक नुकसान हो चुका होता है।
यदि Romeo-Juliet Clause को कानून में शामिल किया जाता है, तो इससे न्याय व्यवस्था को कई स्तरों पर लाभ होगा। अदालतों पर बोझ कम होगा, पुलिस को विवेकपूर्ण निर्णय लेने का अवसर मिलेगा, और युवाओं का भविष्य अनावश्यक रूप से खराब नहीं होगा। साथ ही, इससे कानून की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी, क्योंकि आम जनता को लगेगा कि कानून कठोर जरूर है, लेकिन न्यायपूर्ण भी है।
कई लोग यह चिंता व्यक्त करते हैं कि कहीं इस तरह के प्रावधान से वास्तविक अपराधियों को फायदा न मिल जाए। लेकिन यह डर पूरी तरह उचित नहीं है, क्योंकि दुनिया के जिन देशों में यह व्यवस्था लागू है, वहाँ स्पष्ट सीमाएँ तय की गई हैं। उम्र का अंतर सीमित रखा जाता है, सहमति अनिवार्य होती है, और जहाँ power imbalance हो – जैसे शिक्षक और छात्र, अभिभावक और बच्चा – वहाँ ऐसी छूट नहीं दी जाती। भारत भी यदि चाहे तो एक संतुलित और सुरक्षित मॉडल विकसित कर सकता है।
इस पूरे विषय में केवल कानून नहीं, समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। परिवारों को समझना होगा कि हर युवा रिश्ता अपराध नहीं होता। बच्चों से संवाद, समझ और विश्वास की जरूरत है, न कि डर और दबाव की। कानून समाज के लिए होता है, समाज के खिलाफ नहीं।
Read More: भारत में न्याय क्यों देर से मिलता है? कोर्ट पेंडेंसी की असली वजह
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी दरअसल एक संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण की ओर इशारा करती है। POCSO कानून का उद्देश्य बच्चों की रक्षा है, और वह उद्देश्य बना रहना चाहिए। लेकिन उसी कानून के कारण यदि निर्दोष युवाओं की जिंदगी तबाह होने लगे, तो कानून में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट हो जाती है। Romeo-Juliet Clause भारत जैसे समाज के लिए एक व्यावहारिक और संतुलित समाधान हो सकता है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाती है या नहीं। लेकिन इतना तय है कि यह बहस अब केवल अदालत तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज के हर जागरूक नागरिक के लिए सोचने का विषय बन चुकी है।
