POCSO Act, 2012 बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया एक विशेष कानून है। इसका उद्देश्य सिर्फ सज़ा देना नहीं है, बल्कि पूरी प्रक्रिया को child-friendly बनाना है — चाहे वह FIR दर्ज करना हो, बयान लेना हो, मेडिकल कराना हो या ट्रायल चलाना हो।
लेकिन जमीनी स्तर पर इस कानून को लागू करने में कई गंभीर चुनौतियाँ सामने आ रही हैं। Child Welfare Committee (CWC), Juvenile Justice Board (JJB), Special Courts और बाल संरक्षण विभाग में काम कर रहे लोगों के लिए इन चुनौतियों को समझना बहुत जरूरी है।
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सबसे बड़ी समस्या है संसाधनों की कमी। कई जिलों में POCSO के लिए अलग Special Court तो नाम मात्र के हैं, लेकिन वही कोर्ट दूसरे आपराधिक मामलों की भी सुनवाई कर रहे होते हैं। इससे Section 35 में जो एक साल में ट्रायल पूरा करने की बात कही गई है, वह practically पूरी नहीं हो पाती।
फॉरेंसिक लैब की कमी और FSL रिपोर्ट में देरी भी एक बड़ी बाधा है। मेडिकल और वैज्ञानिक साक्ष्य समय पर न मिलने से केस कमजोर हो जाता है। NCRB 2022 के अनुसार हजारों केस दर्ज हुए, लेकिन दोषसिद्धि दर लगभग 9% के आसपास रही। यह केवल अदालत की समस्या नहीं, बल्कि पूरी जांच और अभियोजन प्रणाली की कमजोरी को दर्शाता है।
कानूनी प्रक्रिया के स्तर पर भी कई व्यावहारिक समस्याएँ आती हैं। Section 33 के अनुसार बच्चे का बयान महिला पुलिस अधिकारी द्वारा और trusted person की उपस्थिति में लिया जाना चाहिए। लेकिन कई जगह पुलिस को child-friendly तरीके से पूछताछ करने का प्रशिक्षण ही नहीं है। परिणामस्वरूप बच्चे से सामान्य आपराधिक केस की तरह सवाल किए जाते हैं, जिससे वह डर जाता है या बयान बदल देता है।
Section 27 स्पष्ट कहता है कि बच्चे पर कोई दबाव या प्रलोभन नहीं डाला जा सकता। लेकिन सामाजिक दबाव, परिवार का समझौता, या स्थानीय प्रभाव कई मामलों में सच्चाई को दबा देते हैं।
Section 28 में बच्चे की गवाही की योग्यता का प्रश्न आता है। अदालत यह देखती है कि बच्चा सवाल समझ पा रहा है या नहीं। लेकिन जिरह के दौरान यदि संवेदनशीलता न हो तो बच्चा मानसिक रूप से टूट सकता है। इसलिए न्यायिक प्रशिक्षण और संवेदनशील दृष्टिकोण बहुत आवश्यक है।
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राज्य स्तर पर भी असमानताएँ साफ दिखाई देती हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मामलों की संख्या बहुत अधिक है, लेकिन उतने संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। कई जगह Support Person की व्यवस्था कागजों में है, जमीन पर नहीं।
Section 44 और POCSO Rules, 2020 के तहत NCPCR को मॉनिटरिंग का अधिकार दिया गया है। लेकिन राज्यों में नियमित डेटा मॉनिटरिंग और प्रभावी समीक्षा तंत्र की कमी अभी भी बनी हुई है।
इन सबका सबसे बड़ा असर बच्चे पर पड़ता है। लंबी सुनवाई, बार-बार तारीख, आरोपी का दबाव, समाज का कलंक — यह सब बच्चे और उसके परिवार को मानसिक रूप से तोड़ देता है। कई केसों में under-reporting इसलिए भी होती है क्योंकि परिवार को लगता है कि न्याय प्रक्रिया बहुत लंबी और कठिन है।
यहाँ CWC और JJB की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अदालत सज़ा दे सकती है, लेकिन पुनर्वास, परामर्श, मुआवज़ा और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना बाल संरक्षण तंत्र की जिम्मेदारी है। यदि inter-agency coordination मजबूत हो — पुलिस, अभियोजन, न्यायालय और CWC के बीच — तो कानून का प्रभाव वास्तविक रूप से दिख सकता है।
सुधार के लिए कुछ ठोस कदम जरूरी हैं:
• Special Courts की संख्या बढ़ाई जाए
• फॉरेंसिक सुविधाओं को मजबूत किया जाए
• पुलिस और न्यायिक अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण हो
• ई-मॉनिटरिंग और केस ट्रैकिंग सिस्टम लागू हो
• Support Person की वास्तविक नियुक्ति सुनिश्चित की जाए
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POCSO कानून में कमी कम है, लेकिन उसके क्रियान्वयन में गंभीर खामियाँ हैं। जब तक संसाधन, प्रशिक्षण और जवाबदेही मजबूत नहीं होगी, तब तक कानून की मंशा पूरी तरह सफल नहीं हो पाएगी।
POCSO केवल दंडात्मक कानून नहीं है। यह बच्चों की गरिमा, सुरक्षा और न्याय का संवैधानिक दायित्व है। बाल कल्याण तंत्र में काम कर रहे हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह इस कानून को सिर्फ पढ़े नहीं, बल्कि जमीन पर सही तरीके से लागू भी करे।

