Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 (POCSO) केवल यौन अपराधों को दंडित करने वाला कानून नहीं है, बल्कि यह आपराधिक न्याय प्रक्रिया को बाल-अनुकूल बनाने का एक व्यापक प्रयास है। यह अधिनियम इस विचार पर आधारित है कि जब कोई बच्चा यौन अपराध का शिकार होता है, तो न्यायिक प्रक्रिया स्वयं उसके लिए एक नया मानसिक आघात न बन जाए।
Child Welfare Committee (CWC), Juvenile Justice Board (JJB), विशेष न्यायालयों, जिला बाल संरक्षण इकाइयों तथा अन्य बाल कल्याण विभागों में कार्यरत अधिकारियों एवं विधि छात्रों के लिए POCSO की प्रक्रियात्मक सुरक्षा व्यवस्थाओं को समझना अत्यंत आवश्यक है। ये प्रावधान केवल औपचारिकताएँ नहीं, बल्कि विधिक दायित्व हैं।
POCSO की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह जांच की पारंपरिक प्रक्रिया को बदल देता है। सामान्य आपराधिक मामलों में गवाहों को पुलिस थाने बुलाया जाता है, परंतु POCSO के अंतर्गत बच्चे का बयान उसके घर या किसी ऐसे स्थान पर दर्ज किया जाता है जहाँ वह सुरक्षित और सहज महसूस करे। जहाँ संभव हो, महिला पुलिस अधिकारी द्वारा बयान लिया जाना चाहिए। इस व्यवस्था का उद्देश्य भय और संस्थागत दबाव को कम करना है।
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ऑडियो-वीडियो माध्यम से बयान दर्ज करने का प्रावधान साक्ष्य की विश्वसनीयता बढ़ाता है और बार-बार बयान लेने की आवश्यकता को कम करता है। बाल कल्याण समिति के सदस्यों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे यह सुनिश्चित करें कि बच्चे को बार-बार घटना दोहराने के लिए बाध्य न किया जाए, क्योंकि इससे मानसिक आघात गहरा हो सकता है।
POCSO में “सपोर्ट पर्सन” की अवधारणा बाल-अनुकूल न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सपोर्ट पर्सन बच्चे को कानूनी प्रक्रिया सरल भाषा में समझाता है, जांच और सुनवाई के दौरान भावनात्मक सहयोग देता है और संवाद में सहायता करता है। POCSO नियम, 2020 के अंतर्गत यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से मान्यता प्राप्त है। CWC या जिला बाल संरक्षण इकाई की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वे उपयुक्त सपोर्ट पर्सन की पहचान और नियुक्ति में सहायता कर सकते हैं।
गोपनीयता की रक्षा POCSO की मूल आत्मा है। बच्चे की पहचान का प्रकटीकरण पूर्णतः प्रतिबंधित है। यह दायित्व केवल पुलिस या न्यायालय तक सीमित नहीं, बल्कि बाल कल्याण संस्थानों और प्रशासनिक अधिकारियों पर भी लागू होता है। पहचान उजागर होने से सामाजिक कलंक, बहिष्कार या अतिरिक्त मानसिक पीड़ा हो सकती है। अतः गोपनीयता बनाए रखना कानूनी और नैतिक दोनों दृष्टि से अनिवार्य है।
ट्रायल की प्रक्रिया भी विशेष रूप से संरक्षित है। POCSO के अंतर्गत सुनवाई इन-कैमरा (in-camera) की जाती है, अर्थात् सार्वजनिक रूप से नहीं। विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करता है कि बच्चे और आरोपी के बीच प्रत्यक्ष आमना-सामना से बचा जाए। आवश्यकता होने पर स्क्रीन या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग किया जा सकता है। जिरह (cross-examination) के दौरान भी न्यायालय की जिम्मेदारी है कि प्रश्न अपमानजनक या भय उत्पन्न करने वाले न हों।
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इस प्रकार, न्यायालय केवल निष्पक्ष निर्णय देने वाला मंच नहीं, बल्कि बच्चे की गरिमा और मानसिक सुरक्षा का संरक्षक भी है।
POCSO और Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 के बीच समन्वय भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि बच्चा “care and protection” की श्रेणी में आता है, तो CWC पुनर्वास, परामर्श, आश्रय, शिक्षा और मुआवजा जैसे उपाय सुनिश्चित करती है। आपराधिक मुकदमा अपराधी की जवाबदेही तय करता है, जबकि बाल कल्याण तंत्र बच्चे के पुनर्वास और पुनर्स्थापन पर केंद्रित रहता है। दोनों व्यवस्थाएँ परस्पर पूरक हैं।
POCSO की प्रक्रियात्मक संरचना को “ट्रॉमा न्यूनिकरण सिद्धांत” (Trauma Minimization Principle) के रूप में समझा जा सकता है। यह मान्यता है कि न्याय प्रक्रिया स्वयं बच्चे के लिए दूसरा उत्पीड़न न बन जाए। इसलिए पुलिस, अभियोजक, न्यायाधीश और बाल संरक्षण अधिकारी—सभी पर संवेदनशील और पेशेवर आचरण का दायित्व है।
व्यावहारिक स्तर पर इन प्रावधानों की सफलता संस्थागत समन्वय पर निर्भर करती है। CWC को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे को उसके अधिकार सरल भाषा में बताए जाएँ। Juvenile Justice Board और विशेष न्यायालयों को बाल-अनुकूल वातावरण बनाए रखना चाहिए। जिला बाल संरक्षण इकाइयों को मनोसामाजिक सहायता उपलब्ध करानी चाहिए।
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कानून ढांचा प्रदान करता है, परंतु उसकी प्रभावशीलता उसके संवेदनशील क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
अंततः, POCSO अधिनियम, 2012 भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक है। यह अधिनियम बच्चों को केवल गवाह या पीड़ित नहीं, बल्कि अधिकार-धारी व्यक्ति के रूप में मान्यता देता है। जांच और ट्रायल के दौरान गरिमा, गोपनीयता, मानसिक सुरक्षा और त्वरित न्याय सुनिश्चित करना ही इसकी मूल भावना है।
बाल कल्याण समिति, किशोर न्याय बोर्ड, विधि छात्र और बाल संरक्षण विभागों में कार्यरत सभी व्यक्तियों के लिए इन प्रक्रियात्मक सुरक्षा प्रावधानों की गहन समझ अत्यंत आवश्यक है, ताकि कानून की आत्मा व्यवहार में पूर्ण रूप से साकार हो सके।

