भारत में “Right to Be Forgotten (RTBF)” पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जा रही हालिया सुनवाई ने निजता, प्रतिष्ठा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन को फिर से केंद्र में ला दिया है। प्रश्न यह नहीं है कि क्या व्यक्ति को अपनी निजता का अधिकार है, बल्कि यह है कि क्या आपराधिक मामलों से जुड़े सत्य, सार्वजनिक रिकॉर्ड और समाचार रिपोर्टों को समय बीतने या discharge/acquittal के बाद इंटरनेट से मिटाया जा सकता है।
यह मुद्दा केवल व्यक्तिगत अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि open justice, press freedom, और digital archives की मूल अवधारणाओं को भी प्रभावित करता है।
निजता का संवैधानिक आधार और RTBF की उत्पत्ति
Justice K.S. Puttaswamy v. Union of India (2017) में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निजता Article 21 के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार है। इस निर्णय में यह स्वीकार किया गया कि व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत डेटा, पहचान और प्रतिष्ठा पर नियंत्रण का अधिकार है। यहीं से भारतीय संदर्भ में “Right to Be Forgotten” की अवधारणा को वैचारिक आधार मिला।
हालाँकि, Puttaswamy निर्णय ने यह भी साफ किया कि निजता का अधिकार absolute नहीं है। इसे हमेशा अन्य संवैधानिक अधिकारों—विशेष रूप से Article 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता—के साथ संतुलित किया जाना होगा।
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भारत में RTBF का विधायी अभाव और न्यायिक विकास
भारत में अभी तक RTBF पर कोई स्वतंत्र, स्पष्ट कानून मौजूद नहीं है। हालाँकि, Digital Personal Data Protection Act, 2023 के Section 12(3) के तहत व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत डेटा के erasure का सीमित अधिकार दिया गया है, जब डेटा का उद्देश्य समाप्त हो जाए।
लेकिन यह अधिकार journalistic content, court records, और public interest reporting पर स्वतः लागू होता है या नहीं—यह प्रश्न अभी विधायी और न्यायिक रूप से स्पष्ट नहीं है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट को इस विषय पर संवैधानिक दिशा-निर्देश तय करने पड़ रहे हैं।
प्रेस की स्वतंत्रता बनाम निजता: open justice का सिद्धांत
भारतीय संविधान Article 19(1)(a) के तहत प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का स्तंभ मानता है। आपराधिक मामलों की रिपोर्टिंग, विशेषकर जब वह अदालत की कार्यवाही और सार्वजनिक रिकॉर्ड पर आधारित हो, open justice के सिद्धांत का हिस्सा है।
Section 327 CrPC (अब BNSS के अनुरूप) यह स्पष्ट करता है कि आपराधिक न्यायालय “open courts” होते हैं। ऐसे में, यदि सत्य और तथ्यात्मक समाचार रिपोर्टों को केवल discharge या acquittal के आधार पर हटाया जाने लगे, तो यह न्यायिक पारदर्शिता और ऐतिहासिक रिकॉर्ड दोनों को कमजोर कर सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट की वर्तमान सुनवाई और संवैधानिक संकेत
हालिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा किसी समाचार रिपोर्ट को हटाने का आदेश precedent नहीं माना जाएगा। न्यायालय ने मीडिया संस्थानों से जवाब माँगते हुए यह संकेत दिया है कि RTBF को case-by-case balancing test के आधार पर ही लागू किया जा सकता है।
कोर्ट का रुख यह दर्शाता है कि
इतिहास को मिटाना समाधान नहीं है
लेकिन असाधारण परिस्थितियों में redaction या de-indexing जैसे सीमित उपाय संभव हो सकते हैं
अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण: भारत अकेला नहीं है
यूरोपीय संघ (EU)
यूरोपीय संघ में GDPR के तहत RTBF को वैधानिक मान्यता प्राप्त है। Google Spain (2014) मामले में EU Court ने de-indexing को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि यह अधिकार public interest, criminal records और public figures पर सीमित होगा। यानी वहाँ भी पूर्ण deletion को सामान्य नियम नहीं माना गया।
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)
अमेरिका में RTBF को मान्यता नहीं है। वहाँ First Amendment के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि है। अमेरिकी न्यायालयों का दृष्टिकोण है कि सत्य और सार्वजनिक रिकॉर्ड को हटाना इतिहास के पुनर्लेखन के समान होगा। इसलिए वहाँ “right to remember” को प्राथमिकता दी जाती है।
यूनाइटेड किंगडम (UK)
UK में GDPR के बाद सीमित RTBF मौजूद है, लेकिन journalistic exemption के कारण समाचार रिपोर्टों और डिजिटल आर्काइव को विशेष संरक्षण प्राप्त है। केवल वही सामग्री हटाई जाती है जो अनुपयुक्त, असंगत या अत्यधिक हो।
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भारत के लिए संवैधानिक दिशा क्या हो सकती है?
अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह दर्शाता है कि भारत में भी:
complete deletion के बजाय
anonymisation, redaction या search engine de-indexing
जैसे उपाय अधिक संवैधानिक और व्यावहारिक होंगे।
इससे
Article 21 के तहत निजता सुरक्षित रहेगी
Article 19(1)(a) और open justice कमजोर नहीं होंगे
और मीडिया की भूमिका लोकतंत्र में बनी रहेगी
निष्कर्ष
Right to Be Forgotten कोई इतिहास मिटाने का औज़ार नहीं, बल्कि निजता और गरिमा की रक्षा का सीमित संवैधानिक साधन है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती यह है कि वह ऐसा संतुलन स्थापित करे जो
व्यक्ति की प्रतिष्ठा की रक्षा करे
प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित न करे
और न्यायिक पारदर्शिता को बनाए रखे
आने वाला निर्णय न केवल भारतीय डिजिटल निजता कानून की दिशा तय करेगा, बल्कि यह भी निर्धारित करेगा कि लोकतंत्र डिजिटल युग में अपनी स्मृति को कैसे संरक्षित करता है।

