भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में जमानत का उद्देश्य सज़ा से पहले व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना है। इसके बावजूद, आज High Courts में नियमित और अग्रिम जमानत याचिकाओं का लंबे समय तक लंबित रहना एक गंभीर संवैधानिक संकट बन चुका है। जब किसी व्यक्ति को बिना ट्रायल वर्षों तक हिरासत में रखा जाता है, तो यह सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” के अधिकार को प्रभावित करता है। जमानत का प्रश्न केवल प्रक्रिया का नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता का प्रश्न है।
Current Status and Judicial Disapproval
4 फ़रवरी 2026 को Supreme Court ने High Courts में लंबित जमानत याचिकाओं पर तीखी नाराज़गी व्यक्त की। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जमानत मामलों में इस प्रकार की देरी “न्यायिक असंवेदनशीलता” को दर्शाती है। Court ने सभी High Courts के Registrars General को निर्देश दिया कि 1 जनवरी 2025 के बाद दाख़िल हुई सभी जमानत और अग्रिम जमानत याचिकाओं का विस्तृत डेटा प्रस्तुत किया जाए।
यह निर्देश इस बात का संकेत है कि Supreme Court अब इस समस्या को केवल प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि संवैधानिक उल्लंघन के रूप में देख रहा है।
Causes of Delays
जमानत मामलों में देरी के पीछे कई संरचनात्मक कारण हैं। High Courts में न्यायाधीशों की भारी कमी, मामलों का अत्यधिक बोझ, बार-बार की जाने वाली स्थगन (adjournments) और समयबद्ध सूचीकरण (listing) की प्रभावी प्रणाली का अभाव प्रमुख कारण हैं। कई High Courts में जमानत याचिकाएँ महीनों तक सूचीबद्ध ही नहीं होतीं।
इसके अतिरिक्त, जमानत मामलों को अन्य miscellaneous मामलों के समान प्राथमिकता देना भी देरी का बड़ा कारण बनता है, जबकि जमानत सीधे व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है।
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Legal Framework and Statutory Provisions
नई आपराधिक कानून व्यवस्था के तहत Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS) ने CrPC का स्थान ले लिया है। BNSS में जमानत से संबंधित प्रावधानों का मूल उद्देश्य वही रखा गया है—“jail is the exception, bail is the rule”।
BNSS की धारा 478 बailable offences में व्यक्ति को जमानत का अधिकार प्रदान करती है।
धारा 479 non-bailable offences में न्यायालय को विवेकाधिकार देती है, लेकिन इसका प्रयोग तर्कसंगत और समयबद्ध होना चाहिए।
धारा 480 अग्रिम जमानत (anticipatory bail) का प्रावधान करती है।
धारा 483 High Court और Sessions Court को जमानत देने, शर्तों में संशोधन और राहत देने की विशेष शक्तियाँ प्रदान करती है।
इन प्रावधानों की आत्मा यह है कि जमानत याचिकाओं का शीघ्र निस्तारण किया जाए, न कि उन्हें अनिश्चित काल तक लंबित रखा जाए।
Implications for Personal Liberty
जब किसी व्यक्ति की जमानत याचिका महीनों या वर्षों तक लंबित रहती है, तो वह बिना दोष सिद्ध हुए दंड भुगतने के समान स्थिति में होता है। Supreme Court बार-बार यह दोहरा चुका है कि जमानत मामलों में देरी अनुच्छेद 21 का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि स्वतंत्रता से जुड़ा कोई भी मामला अन्य प्रशासनिक या प्रक्रियात्मक मामलों से ऊपर रखा जाना चाहिए।
Recent Judicial Actions and Reforms
हालिया आदेश में Supreme Court ने डेटा-आधारित सुधारों पर ज़ोर दिया है। Registrars General को निर्देश दिया गया है कि वे जमानत याचिकाओं की filing date, listing date और disposal status की पूरी जानकारी प्रस्तुत करें।
Court ने यह भी संकेत दिया है कि यदि High Courts द्वारा स्वयं प्रभावी आंतरिक तंत्र विकसित नहीं किया गया, तो Supreme Court बाध्यकारी दिशानिर्देश जारी कर सकता है।
Proposed Reforms and Comparative Perspectives
जमानत मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए कई सुधार प्रस्तावित किए जा रहे हैं, जैसे—
जमानत मामलों के लिए विशेष fast-track benches
जमानत याचिकाओं पर सख़्त समय-सीमा
डिजिटल case-management और auto-listing सिस्टम
अन्य देशों में जमानत पर statutory timelines निर्धारित हैं। भारत में भी ऐसे व्यावहारिक उपाय अपनाए जाने की आवश्यकता है ताकि स्वतंत्रता केवल सिद्धांत न रह जाए, बल्कि व्यवहार में भी सुरक्षित रहे।
In conclusion
High Courts में जमानत याचिकाओं की लंबित स्थिति केवल न्यायिक देरी नहीं, बल्कि संवैधानिक चेतावनी है। Supreme Court का हालिया हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि अब व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्न पर किसी भी प्रकार की शिथिलता स्वीकार्य नहीं होगी।
यदि समयबद्ध सुधार लागू नहीं किए गए, तो न्याय प्रक्रिया स्वयं अन्याय का माध्यम बन सकती है। जमानत का त्वरित निर्णय केवल अभियुक्त के लिए नहीं, बल्कि विधि के शासन (Rule of Law) के लिए अनिवार्य है।
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FAQs
Q1. BNSS में जमानत से जुड़े प्रमुख प्रावधान कौन से हैं?
BNSS की धारा 478 से 483 तक जमानत और अग्रिम जमानत से संबंधित प्रावधान हैं, जिनका उद्देश्य शीघ्र निर्णय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा है।
Q2. क्या High Court में जमानत याचिका लंबित रहना असंवैधानिक है?
हाँ। Supreme Court ने स्पष्ट किया है कि जमानत में अनुचित देरी Article 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
Q3. Supreme Court ने High Courts को हाल ही में क्या निर्देश दिए हैं?
Court ने सभी High Courts से bail और anticipatory bail मामलों का विस्तृत डेटा मांगा है और सुधार न होने पर सख़्त दिशानिर्देश जारी करने का संकेत दिया है।
Q4. BNSS के तहत क्या जमानत अधिकार है या विवेक?
BNSS के अनुसार जमानत अधिकार है, लेकिन non-bailable मामलों में न्यायालय का विवेक होना चाहिए—मनमानी नहीं।
Q5. Bail delay के खिलाफ़ कानूनी उपाय क्या हैं?
व्यक्ति High Court में early listing का अनुरोध कर सकता है या Supreme Court में Article 136 / 32 के तहत राहत मांग सकता है।
Q6. Supreme Court ने bail मामलों को प्राथमिकता क्यों दी है?
क्योंकि जमानत सीधे व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी है और बिना ट्रायल लंबे समय तक हिरासत न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।

