आज देश की राजनीति और कानून दोनों में सबसे ज़्यादा चर्चा में एक सवाल है — ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट क्यों गईं? यह मामला सिर्फ एक राज्य या एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध मतदाता अधिकार, चुनावी प्रक्रिया और संविधान से जुड़ा हुआ है।
विवाद की जड़ है Special Intensive Revision (SIR) यानी मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण। चुनाव आयोग समय-समय पर मतदाता सूची को अपडेट करता है, लेकिन पश्चिम बंगाल में चल रही SIR प्रक्रिया को लेकर आरोप लगाया गया कि इसके ज़रिए बड़ी संख्या में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा सकते हैं। ममता बनर्जी का कहना है कि यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर कर सकती है और खास समुदायों या वर्गों को मताधिकार से वंचित करने का खतरा पैदा करती है।
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इसी आशंका के आधार पर ममता बनर्जी ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उनकी याचिका का मुख्य तर्क यह है कि चुनाव आयोग की यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार) की भावना के खिलाफ हो सकती है। अगर किसी नागरिक का नाम बिना पर्याप्त कारण और उचित प्रक्रिया के मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहाँ दो संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों का संतुलन देखा जाता है — एक तरफ चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, और दूसरी तरफ नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा। कोर्ट पहले भी कई मामलों में कह चुका है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र है, लेकिन उसकी हर कार्रवाई संवैधानिक सीमाओं के भीतर होनी चाहिए।
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ममता बनर्जी की सुप्रीम कोर्ट में मौजूदगी ने इस मामले को और ज़्यादा संवेदनशील बना दिया है। यह संदेश जाता है कि यह केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी संरचना से जुड़ा मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट की भूमिका यहाँ यह तय करने की होगी कि क्या SIR प्रक्रिया पर्याप्त safeguards के साथ लागू की जा रही है या नहीं, और क्या आम नागरिकों को सुनवाई और आपत्ति का पूरा अवसर मिल रहा है।
कानूनी दृष्टि से देखें तो यह मामला आने वाले समय में एक महत्वपूर्ण precedent बन सकता है। अगर कोर्ट यह मानता है कि SIR प्रक्रिया में खामियाँ हैं, तो न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया पर असर पड़ेगा। वहीं अगर कोर्ट चुनाव आयोग की प्रक्रिया को सही ठहराता है, तो यह स्पष्ट करेगा कि किन परिस्थितियों में ऐसे revision संवैधानिक माने जाएंगे।
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आम नागरिक के लिए इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा संदेश यही है कि मताधिकार सिर्फ एक अधिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। जब भी किसी सरकारी प्रक्रिया से यह अधिकार प्रभावित होता दिखे, तो न्यायपालिका आख़िरी और सबसे मज़बूत सहारा बनती है। ममता बनर्जी का सुप्रीम कोर्ट जाना इसी संवैधानिक व्यवस्था का एक उदाहरण है, जहाँ अंतिम निर्णय कानून और संविधान के आधार पर होगा, न कि राजनीतिक बयानबाज़ी पर।

