सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट में Article 224A के तहत पाँच रिटायर्ड जजों को ad hoc जज के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण विकास के रूप में देखा जा रहा है। इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य देश में लगातार बढ़ती case pendency, विशेष रूप से आपराधिक मामलों के भारी बैकलॉग से निपटना है। यह फैसला यह दर्शाता है कि न्यायपालिका अब केवल स्थायी नियुक्तियों पर निर्भर न रहकर संविधान में उपलब्ध वैकल्पिक उपायों को भी सक्रिय रूप से अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
Historical Context and Rarity of Invocation
Article 224A को संविधान में 15वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1963 के माध्यम से शामिल किया गया था। यह प्रावधान मूल रूप से पहले भी अस्तित्व में था, लेकिन 1956 के 7वें संशोधन के बाद इसे हटाया गया और फिर 1963 में पुनः जोड़ा गया। इसके बावजूद, स्वतंत्र भारत के इतिहास में 2025 से पहले केवल तीन बार ही इस प्रावधान का उपयोग किया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह एक अत्यंत rarely invoked constitutional mechanism रहा है।
इसका प्रमुख कारण 2021 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कठोर शर्तें थीं, जिनके अनुसार तभी ad hoc जजों की नियुक्ति संभव थी जब हाईकोर्ट में 20% से अधिक रिक्तियाँ हों और पाँच वर्ष से अधिक पुराने मामलों का पर्याप्त बैकलॉग मौजूद हो। इन सख्त मानकों के कारण Article 224A वर्षों तक व्यवहार में निष्क्रिय बना रहा।
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Legal and Judicial Evolution
Article 224A को वास्तविक अर्थों में सक्रिय करने का श्रेय Lok Prahari v. Union of India (2021) के ऐतिहासिक फैसले को जाता है। इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि बढ़ती पेंडेंसी न्यायपालिका के लिए एक गंभीर संकट है और Article 224A इसका संवैधानिक समाधान प्रदान कर सकता है। हालांकि, उस समय कोर्ट ने इसके प्रयोग पर कड़े प्रतिबंध लगाए, जिससे इसका व्यावहारिक उपयोग सीमित रह गया।
स्थिति में निर्णायक बदलाव जनवरी 2025 में आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने इन शर्तों को शिथिल करते हुए प्रत्येक हाईकोर्ट को 2 से 5 ad hoc जज नियुक्त करने की अनुमति दी, बशर्ते उनकी संख्या कुल sanctioned strength के 10% से अधिक न हो। इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि न्यायपालिका अब case pendency को केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि संवैधानिक संकट के रूप में देख रही है।
Significance of the Recent Appointments
इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए पाँच रिटायर्ड जजों की नियुक्ति केवल एक अस्थायी राहत नहीं है, बल्कि यह एक policy-level shift को दर्शाती है। इन नियुक्तियों का उद्देश्य विशेष रूप से लंबित आपराधिक अपीलों और bail matters का शीघ्र निपटारा करना है, जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीधे तौर पर प्रभावित होती है।
इन रिटायर्ड जजों के पास पूर्ण न्यायिक अनुभव है और वे बिना किसी अतिरिक्त प्रशिक्षण के तुरंत न्यायिक कार्य संभाल सकते हैं। यह व्यवस्था न केवल न्यायिक क्षमता को तुरंत बढ़ाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि retired judicial talent को institutional framework के भीतर प्रभावी ढंग से पुनः उपयोग किया जा सकता है।
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Legal Interpretation and Constitutional Implications
Article 224A की भाषा permissive है, न कि mandatory। यह हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को यह अधिकार देती है कि वे राष्ट्रपति की पूर्व सहमति और रिटायर्ड जज की स्वैच्छिक सहमति से उन्हें ad hoc जज के रूप में नियुक्त कर सकें। 2025 के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान की purposive interpretation अपनाई है, जिसमें इसे “last resort” के बजाय एक extraordinary but workable constitutional tool के रूप में देखा गया है।
यह व्याख्यात्मक बदलाव इस तथ्य को स्वीकार करता है कि भारतीय न्यायपालिका अब स्थायी संरचनात्मक कमियों के दौर में कार्य कर रही है, जहाँ केवल नियमित नियुक्तियाँ पर्याप्त नहीं रह गई हैं।
Administrative and Systemic Impact
Article 224A के तहत ad hoc जजों की नियुक्ति प्रशासनिक दृष्टि से भी अधिक व्यावहारिक है। नियमित जजों की नियुक्ति जहाँ लंबी विधायी और राजनीतिक प्रक्रियाओं से गुजरती है, वहीं ad hoc नियुक्तियाँ अपेक्षाकृत तेज़ और लचीली हैं। दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा bench composition को लेकर दिए गए स्पष्टीकरण ने इस व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बना दिया है। अब हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यह तय कर सकते हैं कि bench में दो ad hoc जज होंगे, या एक sitting और एक ad hoc जज, और कौन preside करेगा। इससे न्यायिक कार्य में लचीलापन और दक्षता दोनों बढ़ती हैं।
यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट में Article 224A के तहत यह प्रयोग सफल रहता है, तो यह अन्य हाईकोर्ट्स के लिए भी एक template बन सकता है। देशभर में बढ़ती पेंडेंसी और जजों की कमी को देखते हुए, यह संभावना प्रबल है कि आने वाले वर्षों में इस प्रावधान का अधिक व्यापक उपयोग किया जाएगा।
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हालाँकि, इसके साथ कुछ संवैधानिक प्रश्न भी जुड़े हैं — क्या ad hoc नियुक्तियाँ स्थायी समाधान बन सकती हैं? क्या इससे नियमित नियुक्तियों की urgency कम होगी? और क्या यह न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांत पर कोई दीर्घकालिक प्रभाव डालेगा? इन सवालों के उत्तर भविष्य की न्यायिक प्रथा और अनुभवों से ही सामने आएँगे।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा Article 224A के तहत रिटायर्ड जजों की नियुक्ति यह स्पष्ट संकेत देती है कि न्यायपालिका अब case pendency को लेकर status quo बनाए रखने के पक्ष में नहीं है। यह कदम संविधान में निहित उन प्रावधानों को पुनर्जीवित करता है, जिन्हें दशकों तक लगभग भुला दिया गया था। यदि इसे संतुलन, पारदर्शिता और समयबद्ध समीक्षा के साथ लागू किया गया, तो यह भारतीय न्यायिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण structural reform की शुरुआत साबित हो सकता है।
FAQs
1: Article 224A क्या है?
Article 224A भारतीय संविधान का वह प्रावधान है, जो रिटायर्ड हाईकोर्ट जजों को ad hoc जज के रूप में पुनः नियुक्त करने की अनुमति देता है, ताकि लंबित मामलों का निपटारा किया जा सके।
2: Article 224A का उपयोग अब तक बहुत कम क्यों हुआ?
हालाँकि यह प्रावधान 1963 से मौजूद है, लेकिन इसे केवल अत्यधिक परिस्थितियों में ही लागू किया गया। 2021 तक इसकी शर्तें इतनी सख्त थीं कि इसका व्यावहारिक उपयोग लगभग असंभव था।
3: Supreme Court ने Article 224A को कब सक्रिय किया?
2021 में Lok Prahari v. Union of India केस में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को revive किया और जनवरी 2025 में इसकी शर्तों को व्यवहारिक रूप से आसान बनाया।
4: Ad hoc जजों की नियुक्ति का उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य हाईकोर्ट में बढ़ती case pendency, विशेषकर पुराने आपराधिक मामलों और bail appeals का शीघ्र निपटारा करना है।
5: क्या ad hoc जज स्थायी जज होते हैं?
नहीं। ad hoc जज अस्थायी होते हैं और उनकी नियुक्ति केवल सीमित अवधि व विशेष उद्देश्य के लिए की जाती है।
6: क्या यह व्यवस्था न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित करती है?
यदि पारदर्शिता और समय-सीमा के साथ लागू की जाए, तो यह व्यवस्था न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं करती, बल्कि सिस्टम को मजबूत बनाती है।
7: क्या भविष्य में अन्य हाईकोर्ट्स में भी ऐसा हो सकता है?
हाँ। यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट में यह मॉडल सफल रहता है, तो अन्य हाईकोर्ट्स में भी Article 224A के तहत नियुक्तियाँ संभव हैं।
8: क्या यह स्थायी समाधान है?
Article 224A एक temporary constitutional solution है। दीर्घकालिक समाधान के लिए नियमित जजों की नियुक्ति और न्यायिक ढाँचे में सुधार आवश्यक है।
