मतदाता सूची से नाम कब हटता है? वोटर डिसक्वालिफिकेशन के कानूनी कारण और प्रक्रिया
लोकतंत्र की आत्मा: मताधिकार
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, लोकतंत्र केवल शासन की एक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है। लोकतंत्र का सबसे बुनियादी और प्रभावी औज़ार है — मताधिकार (Right to Vote)। मताधिकार वह शक्ति है जिसके माध्यम से एक साधारण नागरिक देश की नीतियों, शासन और न्याय व्यवस्था पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालता है। परंतु कल्पना कीजिए — जब किसी नागरिक का नाम अचानक मतदाता सूची (Voter List) से हटा दिया जाता है या वह डिसक्वालीफाई (Disqualified) हो जाता है, तो यह केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों पर आघात है।
मतदाता सूची से नाम हट जाना, या मतदान के अधिकार से वंचित होना, केवल कानूनी प्रश्न नहीं है — यह नागरिकता, पहचान, और लोकतांत्रिक भागीदारी का संकट भी है। इसीलिए यह समझना आवश्यक है कि आखिर कब, क्यों और किन परिस्थितियों में कोई व्यक्ति मतदाता सूची से अयोग्य घोषित हो सकता है।
मतदाता सूची की कानूनी नींव
भारत में मतदाता सूची का निर्माण और प्रबंधन Representation of the People Act, 1950 (जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950) के तहत किया जाता है। इस अधिनियम की धारा 14 से 23 तक मतदाता सूची के निर्माण, संशोधन, और नाम काटने की प्रक्रिया का विस्तृत प्रावधान किया गया है।
भारत का चुनाव आयोग (Election Commission of India) इस सूची को तैयार करने और उसकी शुद्धता बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है। प्रत्येक राज्य में मुख्य निर्वाचन अधिकारी (Chief Electoral Officer), जिला निर्वाचन अधिकारी (District Election Officer) और निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (Electoral Registration Officer) की भूमिकाएं स्पष्ट रूप से तय हैं। यह सूची हर विधानसभा क्षेत्र (Assembly Constituency) के अंतर्गत तैयार की जाती है, और इसमें शामिल होना ही किसी व्यक्ति के मताधिकार के प्रयोग का आधार है।
मतदाता सूची में नाम जुड़ने और हटने की प्रक्रिया – नागरिक भागीदारी की पहली सीढ़ी
1. नाम जोड़ने की प्रक्रिया: नागरिकता का सक्रिय दावा
भारत में कोई भी नागरिक, जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी कर ली हो और जो किसी विधानसभा क्षेत्र का निवासी हो, वह मतदाता सूची में अपना नाम जोड़ सकता है। इस प्रक्रिया को चुनाव आयोग ने अत्यंत सरल बनाया है — अब यह ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से संभव है।
(क) ऑनलाइन पंजीकरण:
राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल (NVSP) या “Voter Helpline” ऐप के माध्यम से Form-6 भरकर नाम जोड़ा जा सकता है। इस फॉर्म में व्यक्ति को अपनी आयु, नागरिकता, और निवास का प्रमाण देना होता है।
(ख) ऑफलाइन पंजीकरण:
निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के कार्यालय में जाकर Form-6 भरा जा सकता है। साथ में आधार कार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड या बिजली बिल जैसे दस्तावेज़ संलग्न किए जाते हैं।
(ग) सत्यापन प्रक्रिया:
फॉर्म जमा करने के बाद, संबंधित अधिकारी द्वारा स्थल निरीक्षण किया जाता है। यदि सबूत सही पाए जाते हैं, तो नाम मतदाता सूची में जोड़ दिया जाता है।यह प्रक्रिया न केवल मतदान के अधिकार को सुनिश्चित करती है, बल्कि नागरिकता के सक्रिय अभ्यास का प्रतीक भी है।
2. नाम हटाने की प्रक्रिया: पारदर्शिता और निष्पक्षता का प्रश्न
मतदाता सूची की शुद्धता तभी बनी रह सकती है जब इसमें केवल पात्र व्यक्ति ही शामिल हों। इसलिए, कानून यह व्यवस्था करता है कि ऐसे व्यक्तियों के नाम सूची से हटाए जा सकें जो अब पात्र नहीं हैं।
(क) मृत्यु के कारण नाम हटाना:
(ख) स्थान परिवर्तन:
जब कोई व्यक्ति स्थायी रूप से किसी अन्य विधानसभा क्षेत्र में चला जाता है, तो उसके पुराने क्षेत्र से नाम हटाया जाता है और नए क्षेत्र में जोड़ा जाता है। इसके लिए नया Form-6 उसी क्षेत्र में जमा करना होता है जहाँ व्यक्ति अब रह रहा है।
(ग) दोहरी प्रविष्टि (Duplicate Entry):
कई बार तकनीकी कारणों या पुनर्वास के चलते एक व्यक्ति का नाम दो जगह आ जाता है। इस स्थिति में ERO द्वारा जांच कर एक प्रविष्टि हटा दी जाती है।
(घ) अयोग्यता या कानूनी निषेध:
यदि व्यक्ति किसी कानूनी या संवैधानिक कारण से मताधिकार से वंचित किया गया है (जैसे मानसिक अयोग्यता, नागरिकता समाप्त होना आदि), तो उसका नाम हटाया जा सकता है।
3. नाम हटाने की गलतियाँ और नागरिकों की परेशानी
4. नागरिक की जिम्मेदारी
लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं चलता; इसमें नागरिकों की जिम्मेदारी भी शामिल है। हर व्यक्ति को चाहिए कि वह समय-समय पर अपनी मतदाता सूची की स्थिति जांचे — विशेषकर चुनाव से पहले। क्योंकि एक बार नाम हट जाने पर पुनः जोड़ना समय लेने वाली प्रक्रिया बन जाती है।
कब और क्यों मतदाता को अयोग्य घोषित किया जा सकता है – कानूनी आधार
1. आयु संबंधी अयोग्यता (Age Disqualification)
भारत में 18 वर्ष की आयु पूर्ण करने वाला हर नागरिक मतदाता बनने का पात्र है। यदि कोई व्यक्ति मतदाता सूची में नाम दर्ज कराता है लेकिन बाद में यह पाया जाता है कि उसने गलत जानकारी दी थी और उसकी आयु 18 वर्ष से कम थी, तो उसका नाम हटाया जा सकता है। यह अयोग्यता Representation of the People Act, 1950 की धारा 16(1)(a) के तहत आती है।
2. नागरिकता से संबंधित अयोग्यता
केवल भारतीय नागरिक ही मतदाता सूची में नाम दर्ज करा सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति भारत की नागरिकता छोड़ देता है या विदेशी नागरिकता ग्रहण करता है, तो वह मतदान के लिए अयोग्य हो जाता है। यह प्रावधान धारा 16(1)(b) के तहत लागू होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई भारतीय नागरिक कनाडा या अमेरिका की नागरिकता ले लेता है, तो भारतीय निर्वाचन सूची से उसका नाम स्वतः हटाया जाएगा।
3. मानसिक रूप से अयोग्य व्यक्ति
यदि किसी व्यक्ति को किसी सक्षम न्यायालय ने “Unsound Mind” घोषित किया है और उसके लिए अभिभावक नियुक्त किया गया है, तो उसे मतदान का अधिकार नहीं होता। यह निषेध इसलिए है क्योंकि मतदान निर्णय लेने की मानसिक क्षमता से जुड़ा कार्य है। यह भी धारा 16(1)(c) के अंतर्गत आता है।
4. आपराधिक दोषसिद्धि (Criminal Conviction)
Representation of the People Act, 1951 की धारा 8 से 11A के तहत, यदि कोई व्यक्ति कुछ गंभीर अपराधों में दोषी पाया जाता है, तो उसे अस्थायी या स्थायी रूप से मतदान से वंचित किया जा सकता है।
उदाहरण:
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धारा 8(1): भ्रष्टाचार, आतंकवाद, मादक पदार्थ तस्करी जैसे अपराधों में सजा पाने वाला व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता और कुछ मामलों में वोट देने से भी वंचित होता है।
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धारा 11A: दोषसिद्ध व्यक्ति के मतदान अधिकार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है, यदि न्यायालय ऐसा आदेश दे।
हालांकि, भारत में आम तौर पर केवल चुनाव लड़ने का अधिकार रोका जाता है, वोट देने का नहीं, जब तक कि कानून विशेष रूप से न कहे।
5. दोहरी प्रविष्टि या पहचान की गड़बड़ी
6. चुनाव आयोग का विवेकाधिकार
निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी को यह अधिकार है कि वह किसी व्यक्ति की पात्रता पर संदेह होने पर जांच कर सके और प्रमाण मिलने पर उसका नाम हटा सके। हालांकि, यह कार्य न्यायसंगत प्रक्रिया (Principle of Natural Justice) के तहत होना चाहिए — यानी व्यक्ति को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का अवसर देना आवश्यक है।
Representation of the People Act, 1950 – मतदाता सूची का संवैधानिक ढाँचा
यह अधिनियम भारत में मतदाता सूची की आत्मा है। 1950 का अधिनियम उस प्रशासनिक और कानूनी ढांचे को परिभाषित करता है जिसके अंतर्गत चुनाव आयोग देश की हर विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करता है।
1. उद्देश्य और दायरा
2. प्रमुख प्रावधान
धारा 14–15:राज्यों और विधानसभा क्षेत्रों के निर्वाचन रोल की तैयारी से संबंधित है।
धारा 16:यह धारा मतदाता के अयोग्य होने के कारणों को परिभाषित करती है —आयु, नागरिकता, मानसिक अयोग्यता आदि।
धारा 17:किसी व्यक्ति का नाम एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में नहीं हो सकता।
धारा 22–23:यह प्रावधान सूची से नाम हटाने या सुधारने की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं।
धारा 28:चुनाव आयोग को दिशा-निर्देश जारी करने का अधिकार देती है ताकि निष्पक्षता बनी रहे।
3. मतदाता सूची में पारदर्शिता और शिकायत निवारण
अधिनियम के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का नाम अनुचित रूप से हटा दिया गया है, तो वह निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) से अपील कर सकता है। यदि निर्णय असंतोषजनक हो, तो जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) या मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के पास पुनर्विचार की मांग की जा सकती है।
4. तकनीकी नवाचार और 1950 अधिनियम का आधुनिक अर्थ
Representation of the People Act, 1951 – चुनावी नैतिकता और अयोग्यता की सीमाएँ
1951 का अधिनियम चुनाव की वास्तविक प्रक्रिया, उम्मीदवारों की योग्यता, अयोग्यता, और चुनावी अपराधों से संबंधित है। जहाँ 1950 का अधिनियम मतदाता सूची का ढाँचा तय करता है, वहीं 1951 का अधिनियम चुनाव की आत्मा को परिभाषित करता है।
1. धारा 8 – आपराधिक दोषसिद्धि पर अयोग्यता
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आतंकवाद (Unlawful Activities Act)
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मादक पदार्थ तस्करी (NDPS Act)
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भ्रष्ट्राचार
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मानव तस्करी
इस अवधि के दौरान यदि न्यायालय ऐसा आदेश दे तो उसका मतदान अधिकार भी सीमित किया जा सकता है।
2. धारा 9 – सरकारी कर्मचारियों के हित-संघर्ष
यदि कोई व्यक्ति सरकारी सेवक होते हुए सरकारी अनुबंधों में अनुचित लाभ लेता है, तो वह चुनाव के लिए अयोग्य ठहराया जा सकता है।
3. धारा 10A – गलत विवरण देने पर अयोग्यता
यदि कोई उम्मीदवार अपने निर्वाचन व्यय का विवरण गलत प्रस्तुत करता है, तो चुनाव आयोग द्वारा उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है। यह चुनावी पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
4. न्यायिक समीक्षा और अयोग्यता पर नियंत्रण
कोई भी अयोग्यता न्यायालय की समीक्षा के अधीन है। यदि किसी व्यक्ति को गलत तरीके से अयोग्य घोषित किया गया है, तो वह उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है। यह लोकतंत्र की न्यायिक सुरक्षा का प्रतीक है।
संविधान और मताधिकार का संबंध
भारतीय संविधान ने लोकतंत्र को न केवल शासन की पद्धति के रूप में स्वीकार किया है, बल्कि उसे एक जीवंत सामाजिक दर्शन के रूप में स्थापित किया है। लोकतंत्र की आत्मा ‘मताधिकार’ है — यानी जनता को यह अधिकार कि वह अपने प्रतिनिधि स्वयं चुने। हालांकि भारत में मतदान को “मूल अधिकार (Fundamental Right)” नहीं बल्कि “संवैधानिक अधिकार (Constitutional Right)” माना गया है, फिर भी इसका महत्व किसी भी मौलिक अधिकार से कम नहीं है।
1. संविधान में मताधिकार की संवैधानिक नींव
मताधिकार का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 326 (Article 326) में किया गया है, जो कहता है:
“लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव सामान्य मताधिकार (Adult Suffrage) के आधार पर होंगे; प्रत्येक नागरिक जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, मत देने का पात्र होगा, जब तक कि वह कानून द्वारा अयोग्य घोषित न किया गया हो।”
इस अनुच्छेद का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि
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मताधिकार जाति, धर्म, लिंग, संपत्ति या शिक्षा के आधार पर सीमित न किया जाए;
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और हर नागरिक को समान मतदान का अधिकार मिले।
2. समानता का अधिकार और मताधिकार
मतदाता सूची से नाम कटने के सामाजिक और व्यावहारिक परिणाम
मतदाता सूची से नाम कट जाना केवल एक तकनीकी गलती नहीं होती — इसके गहरे सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक परिणाम होते हैं। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में जहां 90 करोड़ से अधिक मतदाता हैं, वहां एक छोटे से गलती का असर लाखों नागरिकों की आवाज़ को मौन कर सकता है।
1. लोकतांत्रिक सहभागिता पर प्रभाव
जब किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाता है, तो वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है। वह सरकार के गठन में भाग नहीं ले सकता, न अपने प्रतिनिधि को चुन सकता है। यह लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत के विपरीत है कि “जन ही जनार्दन है।”
2. वंचित वर्गों पर असमान असर
कई अध्ययनों में पाया गया है कि मतदाता सूची से नाम कटने की घटनाएँ अधिकतर गरीबों, प्रवासी मजदूरों, दलितों, मुसलमानों, और आदिवासी समुदायों में अधिक होती हैं। कई बार इन्हें यह भी पता नहीं चलता कि उनका नाम सूची से हट गया है। इससे उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर हो जाता है। उदाहरण के तौर पर, असम में NRC (National Register of Citizens) प्रक्रिया के दौरान हजारों लोगों का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था, जिससे उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा।
3. सामाजिक विश्वास में गिरावट
जब नागरिक देखते हैं कि उनके वोट देने का अधिकार प्रशासनिक त्रुटियों या राजनीतिक कारणों से छीन लिया गया है, तो उनके मन में राज्य के प्रति अविश्वास पैदा होता है। यह लोकतंत्र के प्रति जनता की आस्था को कमजोर करता है।
4. महिला मतदाताओं पर असर
भारत में कई बार महिलाओं के नाम बदलने, विवाह के बाद पते बदलने या परिवार के नाम से न जुड़ने के कारण उनके नाम कट जाते हैं। इससे उनका मताधिकार सीमित हो जाता है। यह लैंगिक असमानता (Gender Disenfranchisement) का उदाहरण है।
5. प्रवासी श्रमिकों की स्थिति
जो मजदूर रोज़गार के लिए राज्य बदलते हैं, उनका नाम अक्सर पुराने क्षेत्र से हटा दिया जाता है, पर नए क्षेत्र में जोड़ा नहीं जाता। नतीजतन, वे देश के किसी भी हिस्से में मतदान नहीं कर पाते। यह “Political Homelessness” की स्थिति है।
प्रवासी मजदूरों और वंचित समुदायों पर प्रभाव
भारत में लगभग 45 करोड़ से अधिक आंतरिक प्रवासी मजदूर (Internal Migrant Workers) हैं, जो रोज़गार, शिक्षा या जीवन-यापन के लिए अपने गृह राज्य से बाहर रहते हैं। इनमें से अधिकांश मतदान के अधिकार से वंचित रहते हैं — न इसलिए कि वे नागरिक नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि उनकी नागरिकता को “निवास” के आधार पर सीमित कर दिया गया है।
1. निवास की समस्या
कानून के अनुसार, मतदाता वही हो सकता है जो किसी निर्वाचन क्षेत्र में “Ordinarily Resident” हो। परंतु प्रवासी मजदूरों के पास स्थायी पता या दस्तावेज नहीं होते, जिससे वे न पुराने क्षेत्र में मतदाता रहते हैं, न नए में बन पाते हैं।
2. संवैधानिक असमानता
3. सामाजिक बहिष्कार का प्रभाव
प्रवासी मजदूर, निर्माण कार्यकर्ता, या घरेलू श्रमिक वर्ग — ये सभी समाज के हाशिए पर हैं। मतदाता सूची में उनका नाम न होना उनके राजनीतिक अस्तित्व के बहिष्कार का प्रतीक है।
4. संभावित समाधान
चुनाव आयोग ने 2023 में “Remote Voting Machine (RVM)” की अवधारणा पेश की थी ताकि प्रवासी मजदूर अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र में रहकर मतदान कर सकें। हालाँकि यह अभी प्रयोगात्मक स्तर पर है, पर यदि लागू होता है तो यह “Inclusive Democracy” की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।
चुनाव आयोग की भूमिका और कानूनी जवाबदेही
भारत का चुनाव आयोग (Election Commission of India – ECI) लोकतंत्र का सबसे बड़ा संरक्षक है। यह न केवल चुनाव कराता है, बल्कि सुनिश्चित करता है कि हर योग्य नागरिक को मतदान का अधिकार मिल सके।
1. संवैधानिक स्थिति
चुनाव आयोग की स्थापना संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत की गई है। उसे यह शक्ति दी गई है कि वह संसद, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के चुनावों को स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से संचालित करे।
2. मतदाता सूची पर आयोग की जिम्मेदारी
मतदाता सूची तैयार करना, संशोधन करना, और नाम जोड़ना या हटाना — ये सब चुनाव आयोग की निगरानी में होता है।Chief Electoral Officer (CEO) और District Election Officer (DEO) इसकी प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाते हैं।
3. पारदर्शिता की चुनौती
मतदाता सूची के डिजिटलीकरण के बाद भी कई त्रुटियाँ बनी रहती हैं —जैसे नाम की गलत वर्तनी, पता बदलना, दोहराव, या अचानक हट जाना।इन सबकी जिम्मेदारी अंततः ECI की जवाबदेही पर आती है। इसलिए आयोग को नागरिकों के लिए शिकायत और अपील की प्रक्रिया और अधिक सुलभ बनानी चाहिए।
4. कानूनी उपाय और जवाबदेही
यदि किसी व्यक्ति का नाम बिना कारण मतदाता सूची से हटा दिया गया है, तो वह निम्नलिखित उपाय कर सकता है:
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Form 6A – नाम पुनः जोड़ने के लिए
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Election Registration Officer को लिखित शिकायत
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District Election Officer को अपील
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उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका (Article 226/32) – यदि संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन हुआ हो।
5. जवाबदेही का प्रश्न
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता तभी अर्थपूर्ण होगी जब उसके कार्यों में जवाबदेही और पारदर्शिता भी हो। मतदाता सूची से नाम हटाने जैसी प्रक्रिया को public audit के दायरे में लाना आवश्यक है, ताकि नागरिक स्वयं भी त्रुटियों को देख और सुधार सकें।
मृत मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया
1. परिवार या प्रशासन की जिम्मेदारी
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जब किसी मतदाता की मृत्यु हो जाती है, तो उसके परिवार के सदस्य को स्थानीय Booth Level Officer (BLO) को सूचित करना चाहिए ताकि नाम सूची से हटाया जा सके।
2. साक्ष्य और सत्यापन
BLO मृत प्रमाणपत्र या स्थानीय निकाय से सत्यापन के बाद नाम हटाने की अनुशंसा करता है।
3. राजनीतिक दुरुपयोग
कई बार मृत व्यक्तियों के नाम चुनावी सूची में बने रहते हैं ताकि कोई उनके नाम पर “घोस्ट वोटिंग” कर सके। इसे रोकने के लिए चुनाव आयोग “पुनरीक्षण अभियान” चलाता है।
प्रशासनिक त्रुटियों और सुधार की प्रक्रिया
कभी-कभी अयोग्यता प्रशासनिक भूलों या डेटा एंट्री की गलतियों से भी होती है।
1. गलत नाम या आयु
यदि नाम, आयु या लिंग में गलती है, तो मतदाता Form 8 के जरिए सुधार कर सकता है।
2. नाम हटने पर पुनः प्रविष्टि
यदि किसी का नाम गलती से हट गया है, तो वह Form 6 भरकर दोबारा जोड़ा जा सकता है। इसके लिए आधार, पहचान पत्र और पते का प्रमाण जरूरी होता है।
3. ऑनलाइन प्रक्रिया
अब चुनाव आयोग की वेबसाइट और Voter Helpline App के माध्यम से भी आवेदन किया जा सकता है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और भ्रष्टाचार कम हुआ है।
अपील और पुनर्विचार का अधिकार
यदि किसी व्यक्ति का नाम गलत तरीके से हटाया गया है या अयोग्य घोषित किया गया है, तो वह अपील कर सकता है।
1. अपील का प्रावधान
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 24 के तहत व्यक्ति निर्वाचन रजिस्ट्रेशन अधिकारी (ERO) के आदेश के खिलाफ अपील कर सकता है।
2. अपील की समय सीमा
अयोग्यता या नाम हटाने के आदेश के 15 दिनों के भीतर अपील दाखिल की जानी चाहिए।
3. उच्च न्यायालय का अधिकार
यदि व्यक्ति को लगता है कि ERO या DEO ने मनमाने ढंग से कार्य किया है, तो वह हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सकता है।
लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा
"हर नागरिक का वोट, लोकतंत्र की आवाज़ — जानिए आपका नाम लिस्ट में क्यों जरूरी है।"
